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Explainer: भारत ने सैकड़ों बंगाली मुस्लिमों को बांग्लादेश डिपोर्ट किया- HRW रिपोर्ट

HRW रिपोर्ट: कई लोगों के पहचान पत्र जैसे आधार कार्ड, राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र को यह कहकर अमान्य कर दिया गया कि ये दस्तावेज़ फर्ज़ी हैं।

Explainer: भारत ने सैकड़ों बंगाली मुस्लिमों को बांग्लादेश डिपोर्ट किया- HRW रिपोर्ट
फोटो: Explainer: भारत ने सैकड़ों बंगाली मुस्लिमों को बांग्लादेश डिपोर्ट किया- HRW रिपोर्ट
Human Rights Watch की एक डिटेल्ड रिपोर्ट आई है। जिसमें बताया गया है कि भारत के कई राज्यों में एक संगठित और साइलेंट अभियान के तहत सैकड़ों मुस्लिम नागरिकों को “अवैध बांग्लादेशी” बताकर बांग्लादेश भेजने की प्रक्रिया(HRW रिपोर्ट) चलाई जा रही है। यह सब बिना किसी सार्वजनिक नीति घोषणा, कानूनी पारदर्शिता या मानवीय प्रक्रिया के किया जा रहा है। महाराष्ट्र के कई इलाक़ों में बंगाली बोलने वाले मुस्लिम मज़दूरों के घरों पर पुलिस ने एकदम से छापा मारा। कई लोगों के पहचान पत्र जैसे आधार कार्ड, राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र को यह कहकर अमान्य कर दिया गया कि ये दस्तावेज़ फर्ज़ी हैं। इन लोगों को हिरासत में लेकर डिटेंशन कैंपों में भेज दिया गया, जहाँ ना वकील मिलने की अनुमति थी, ना परिवारवालों से मिलवाया गया। यहाँ कुछ मामलों में ख़ुद पुलिस ने ही तय कर लिया कि ये लोग “बांग्लादेशी हैं”, इसके बाद इन्हें बस ट्रकों में भरकर सीमा के पास भेज दिया गया। गुजरात के अहमदाबाद में तो इसे एक ‘स्वच्छता अभियान’ की तरह चलाया गया। मुस्लिम बहुल बस्तियों को ‘अवैध अतिक्रमण’ बताकर वहां की झुग्गियों, दुकानों और मस्जिदों को बुलडोज़र से गिरा दिया गया। गिराने से पहले ना कोई नोटिस दिया गया, ना रिहैबिलिटेशन की कोई योजना बनी। इन बस्तियों में रहने वाले अधिकतर लोग बंगाली मुसलमान थे, जो वर्षों से वहीं रह रहे थे। ओडिशा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे इलाकों में भी यही पैटर्न दोहराया गया। 

HRW रिपोर्ट: “बांग्लादेशी घुसपैठिया” कहने के पीछे क्या धारणा है?


1970 का दशक, इस वक्त बांग्लादेश में स्वंत्रता संग्राम चल रहा था जिसकी वजह से भारी संख्या में लोग बांग्लादेश से पलयान कर नार्थ-ईस्ट भारत में आ गए। खास कर बांग्लादेश से सटे बंगाल और असम जैसे इलाक़ों में। असम के लोगों ने इसका विरोध किया क्योंकि उन्हें लगता था कि बांग्लादेश से आए लोग उनकी जमीन और नौकरियां छीन रहे हैं। ये विरोध कई सालों तक चला। साल 1985 में एक समझौते के तहत ये विरोध ख़त्म हो गया। समझौते में कहा गया कि 25 मार्च, 1971 के बाद आए लोगों को ढूंढकर निकाला जाएगा। इस समझौते में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनलों को और ताकत दी गई कि आप कागजों के आधार पर तय कीजिए कौन भारतीय है कौन नहीं। यहाँ से शिलशिला शुरू हुआ काग़ज़ातों के आधार पर लोगों को विदेशी ठहराने का। कागज़ों के अभाव में जिन लोगों को विदेशी ठहराया जाता उन्हें जेल में डाल दिया जाता। हालांकि ज़्यादातर बांग्लादेशी बांग्लादेश के अलग देश बन जाने के बाद पहले ही वापस लौट गए थे। इसके बावजूद कुछ रिपोर्ट्स आई जिनमें कुछ चौकाने वाले आंकड़े पेश किए गए। 

अवैध प्रवास को लेकर देशभर में बहस छेड़ने में कामयाब रही HRW रिपोर्ट


साल 1998 में असम के राज्यपाल रहे रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल एस.के. सिन्हा ने एक रिपोर्ट बनाई थी, जो उन्होंने राष्ट्रपति के.आर. नारायणन को भेजी। इस रिपोर्ट में उन्होंने कहा था कि उस वक्त असम में करीब कई लाख “अवैध प्रवासी” रह रहे हैं। उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि अगर ये सिलसिला यूं ही चलता रहा, तो असम की आबादी और सामाजिक संतुलन बदल सकता है, जिससे राज्य की सुरक्षा को भी खतरा हो सकता है। इस रिपोर्ट की काफी आलोचना हुई। जानकारों ने कहा कि इसमें जो आंकड़े दिए गए हैं, वो भरोसेमंद नहीं हैं। उनके मुताबिक, रिपोर्ट में जो बातें कही गईं, वो ज़्यादा डर फैलाने वाली थीं और इससे राज्य में तनाव बढ़ सकता था। भले ही रिपोर्ट में भरोसेमंद आंकड़े ना हो लेकिन ये रिपोर्ट अवैध प्रवास को लेकर देशभर में बहस छेड़ने में कामयाब रही। हर साल सेंकड़ो लोग कागजों के अभाव में जेलों में डाले जा रहे थे। लेकिन नार्थ ईस्ट इंडिया जहाँ हर साल बाढ़ आती है। लोगों के घर बह जाते है, वहाँ कई दशकों तक काग़ज़ संभाल कर रखना आसान ना था। काग़ज़ ना होने की स्थिति में इन लोगों को विदेशी ठहरा कर कुख्यात अपराधियों के साथ जेलों डाल देना, इस पर सवाल खड़े होने लगे थे। जिसके बाद साल 2008 में असम हाई कोर्ट ने तरुण गोगोई सरकार को आदेश दिया कि इन लोगों को डिटेन करने के लिए अलग से व्यवस्था की जाए। जिसके बाद साल 2009 में पहला कैंप तेजपुर में शुरू हुआ।

डिटेन्शन सेंटर के अंदर कैसे रहते हैं लोग?


इसके बाद देश के कई राज्यों में भी डिटेंशन कैम्प बनाये गए। लेकिन डिटेंशन कैम्प भी जेलों से कम नहीं हैं। यहाँ सुबह एक कर्कश सायरन से शुरू होती है। कैदी अपनी पतली, गंदी चटाइयों से उठकर लाइन में खड़े होते हैं, जहां उनकी गिनती होती है। नाश्ते में एक कप फीकी चाय और दो सख्त रोटियां मिलती हैं। "खाना देखकर भूख मर जाती है। कई बार खाना इतना खराब होता है कि लोग उसे फेंक देते हैं। दिन के घंटे अंतहीन इंतजार में बीतते हैं। न कोई काम, न किताब, न हंसी। लोग फर्श पर बैठकर पुरानी यादों में खोए रहते हैं या खामोश रहते हैं। जगह इतनी कम है कि लोग एक-दूसरे से सटकर सोते हैं। रातें ठंडी फर्श पर कटती हैं। बीमारी हर कोने में फैली है, लेकिन इलाज मुश्किल। कोई नियमित डॉक्टर नहीं; कभी-कभार कोई नर्स आती है। गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया जाता है, लेकिन वहां भी कैदियों को बेड से बांधा जाता है। बच्चे इन कैंपों में सबसे ज्यादा टूटते हैं। न खेल का मैदान, न स्कूल। मानसिक तनाव इन कैंपों का सबसे बड़ा जहर है। जो जिंदगियों को निगलने के लिए काफ़ी है। साल 2016 से 2021 तक, सिर्फ़ असम के डिटेंशन कैंपों में 31 लोगों की मौत हो चुकी थी। इसके बाद के आंकड़े अस्पष्ट हैं, हालांकि खबरे हैं। 17 अप्रैल को असम के गोआलपाड़ा जिले में बने मटिया डिटेंशन कैंप में एक कैदी की मौत हो गई। ये देश का सबसे बड़ा डिटेंशन कैंप है। 

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, मरने वाले शख्स का नाम मोहम्मद अब्दुल मोतलिब था, जिन्हें लोग मोतलिब अली भी कहते थे। वो असम के होजाई जिले के मदरताली गांव के रहने वाले थे और दिसंबर 2023 में एक मामले में हिरासत में लिए गए थे। इसके बाद से ही वो इसी कैंप में बंद थे। मोतलिब के बड़े भाई, जमशेद अली ने बताया कि उनके भाई की गिरफ्तारी नागरिकता को लेकर हुए एक विवाद की वजह से हुई थी। असल में, उनके पिता का नाम वोटर लिस्ट में दो अलग-अलग नामों से दर्ज था पहले “काला मियां” और बाद में “अब्दुल हक”। उनका परिवार पहले चांगमाजी पठार में रहता था, लेकिन लगातार बाढ़ की वजह से 1985 से पहले मदरताली गांव में बस गया। इस बदलाव के दौरान नामों में फर्क आ गया, और इसी वजह से परिवार के दस्तावेजों में गड़बड़ी हो गई। जमशेद अली ने बताया कि इसी भ्रम के कारण उनका और उनके भाइयों का नाम NRC से हटा दिया गया। वो और उनके भाई नूर अली इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट गए हैं, और केस अभी चल रहा है। लेकिन दूसरी तरफ, प्रशासन ने पिछले साल गांव में आकर जांच की थी और कई लोगों के बयान लिए थे। इसके बाद ही मोतलिब को गिरफ्तार कर डिटेंशन कैंप में भेज दिया गया था। इसके डेढ़ साल बाद इसी साल 17 अप्रैल को डिटेंशन कैम्प में ही इनकी मौत हो चुकी है। मौत के बाद परिवार ने शव लेने से मना कर दिया था। उन्होंने कहा कि अगर सरकार मानती है कि मोतलिब बांग्लादेशी था, तो फिर उसका शव भी बांग्लादेशियों को ही दिया जाए। बाद में उन्होंने शव ले लिया और गांव के पास ही उसे दफनाया गया।

क़ानूनी प्रिक्रिया की उड़ती धज्जियाँ 


हालांकि सभी को कानूनी तौर पर बांग्लादेशी सिद्ध करने के लिए इन डिटेंशन कैंपों में नहीं रखा जाता, कुछ को बिना कानूनी प्रिक्रिया के भी बांग्लादेश भेज दिया जाता है। और इस साल बंगाली मुसलमानों को डिटेन कर बांग्लादेश भेजने के मामले बढ़ गए हैं। Human Rights Watch की रिपोर्ट कहती है कि भारत ने हज़ारों बंगाली मुसलमानों को बांग्लादेश भेज दिया है। जून महीने में Human Rights Watch ने 18 लोगों से बातचीत की जिनमें कुछ ऐसे लोग थे जिन्हें भारत से निकाला गया, बाद में जब उनकी नागरिकता सिद्ध हो गई तो अब वापस आए। कुल मिलाकर 9 ऐसे मामले सामने आए जिनमें सीधे तौर पर लोगों को बेवजह परेशान किया गया। 8 जुलाई को Human Rights Watch ने अपनी पूरी रिपोर्ट भारत सरकार के गृह मंत्रालय को भेजी, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं आया। भारत सरकार ने अब तक ये भी नहीं बताया कि कुल कितने लोगों को बाहर निकाला गया है। लेकिन बांग्लादेश की बॉर्डर फोर्स यानी Border Guard Bangladesh ने जो जानकारी दी है, उसके मुताबिक, 7 मई से 15 जून के बीच भारत ने करीब 1,500 मुस्लिम मर्दों, औरतों और बच्चों को बांग्लादेश भेज दिया। इनमें से लगभग 100 लोग रोहिंग्या शरणार्थी थे। बांग्लादेश में जिन गांवों में इन्हें धकेला गया, वहां के लोग भी इन्हें पहचानते नहीं थे। एक शख्स Khairul Islam को उस के घर से उठाया गया। ये असम के एक स्कूल में शिक्षक रहे हैं। जब इनके घर पर वर्दी पहने कुछ लोग आए, तो इन्होंने जाने से इनकार कर दिया जिसके बाद इनके पैर पर 4 रबर बुलेट फायर की गई। और घर के बाहर खड़ी एक जीप में Khairul को ठूंस दिया गया। इन वर्दीधारी वालों ने किसी थाने में ले जाकर FIR नहीं लिखवाई, किसी ट्रिब्यूनल या मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया। अगले दिन, उन्हें बाकायदा बांग्लादेश बॉर्डर ले जाकर खदेड़ दिया गया। अब सरकार सीधे कहती है तू घुसपैठिया है और उसे बॉर्डर बार भेज दिया जाता है। ज़्यादातर मामलों में एकतरफा आदेश दिया गया यानि व्यक्ति को बुलाया नहीं गया, सीधे गैरकानूनी घोषित कर दिया गया।

फ़ॉरीग्नर्स ट्रिब्यूनल भी नहीं हैं कारगर 

अब अगर आपको लग रहा है कि ये मामले अगर फ़ॉरीग्नर्स ट्रिब्यूनल में जाएँ तो कुछ बात बन सकती है, न्याय मिल सकता है। लेकिन सच्चाई ये है कि फ़ॉरीग्नर्स ट्रिब्यूनल का हाल भी कुछ अच्छा नहीं है। उदाहरण से समझिए। साल 2012 में रहीम अली नाम के एक सख्स को फ़ॉरीग्नर्स ट्रिब्यूनल ने बांग्लादेशी घुसपैठिया घोषित कर दिया। रहीम अली का कहना था वह बहुत बीमार थे और इसी वजह से वह ट्रिब्यूनल में पेश नहीं हो पाए। इसी दलील के साथ उन्होंने गुवाहाटी हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया, लेकिन उन्हें वहां से भी कोई राहत नहीं मिली। रहीम ने फिर न्याय की आखिरी आस में सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में फ़ॉरीग्नर्स ट्रिब्यूनल को फिर से तय करने का निर्देश दिया कि रहीम अली विदेशी हैं या नहीं। 

इस बार भी, ट्रिब्यूनल ने रहीम की तरफ से पेश दस्तावेजों में स्पेलिंग और तारीखों में गलतियों निकलते हुए विदेशी घोषित कर दिया। 12 साल तक रहीम अली का परिवार कोर्ट के चक्कर काटता रहा। जिसके बाद साल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में रहीम अली को भारतीय नागरिक घोषित कर किया। अब इसे विडंबना कहा जाये या दुर्भाग्य क्योंकि रहीम अली की 28 दिसंबर, 2021 को 58 साल की उम्र में मौत हो गई थी। रहीम अली के मर जाने के बाद उसे भारतीय नागरिक माना गया। रहीम अली का अपराध सिर्फ़ इतना सा था वो अपने पुराने दस्तावेजों में स्पेलिंग और तारीखों की त्रुटियों को ठीक से नहीं साबित कर पाए। रहीम अली जैसे हजारों लोग हैं, जिनकी नागरिकता सिर्फ इस वजह से संदिग्ध बना दी गई क्योंकि उनके पास अंग्रेजी में सही स्पेलिंग वाले कागज़ नहीं थे। असम जैसे राज्यों में, जहां हर साल बाढ़ के कारण लोगों का पुनर्वास होता है, वहां 40-50 साल पुराने दस्तावेज ढूंढ पाना आम आदमी के लिए किसी पहाड़ चढ़ने जैसा है।

एक तरफ सरकार डिजिटल इंडिया की बात करती है, दूसरी तरफ एक पुराना, धूल खाया कागज़ ना होने पर किसी को उसके वतन में ही ‘विदेशी’ बना देती है। अब सवाल ये है कि जब इंसान की पहचान, उसकी नागरिकता, उसकी पूरी ज़िंदगी सिर्फ़ एक कागज़ पर टिकी हो और वो भी ऐसा कागज़ जिसे कोई सरकारी बाबू कभी भी “ग़लत” या “फर्ज़ी” कह दे तो क्या वो इंसान अब भी एक नागरिक कहलाएगा या सिर्फ़ एक नंबर बनकर रह जाएगा? इस दौर में नाम की स्पेलिंग से लेकर बाप-दादाओं के दस्तावेज़ तक की जवाबदेही आम आदमी पर डाल दी गई है। वो आदमी जो रोज़ी कमाने के लिए मज़दूरी करता है, जो बाढ़ में अपने घर बचा नहीं पाया, उससे ये उम्मीद की जा रही है कि वो 40 साल पुराना सबूत लेकर आए कि वो इस देश का नागरिक है। और अगर नहीं ला सका, तो वो “घुसपैठिया” है। ऐसा लगता है नागरिकता कोई संवैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि सत्ता की सहूलियत से दिया गया एक “ठप्पा” है।