अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, बराड़ की कंपनियां जिनमें यूएई और भारत स्थित प्राइम टैंकर्स एलएलसी और ग्लोरी शिपिंग इंटरनेशनल एफजेडई प्रमुख रूप से शामिल हैं। इन जहाजों का संचालन करती हैं जो शिप-टू-शिप ट्रांसफर जैसी गतिविधियों में शामिल रहे हैं। इन जहाजों का संचालन मुख्य रूप से ईरान, इराक, ओमान और यूएई की खाड़ी के बीच किया गया, जहां से ईरानी तेल को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भेजा जाता था। इस प्रकार ये जहाज एक कड़ी के रूप में काम करते थे, जिससे प्रतिबंधित तेल को वैश्विक बाजार तक पहुंचाया जाता।
अमेरिका ने कहा है कि यह पूरा नेटवर्क ईरान के वैकल्पिक राजस्व स्रोतों को मजबूत करता है और अवैध व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा देता है। अमेरिकी वाणिज्य विभाग के मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि ईरान के लिए यह कोई नया तरीका नहीं है। वह वर्षों से शैडो फ्लीट और बिचौलियों के जरिए अपने तेल को विश्व बाजार में भेजता रहा है, और बराड़ जैसे कारोबारी इस व्यवस्था का अहम हिस्सा बन चुके हैं।
जांच में यह भी सामने आया है कि बराड़ की कंपनियों के जहाजों ने ईरानी सेना के निर्देश पर कार्य किया और कई बार ईरान समर्थित यमनी विद्रोही संगठन हूती के साथ भी सहयोग किया गया। अमेरिका ने आरोप लगाया है कि बराड़ ने हूती संगठन के एक प्रमुख वित्तीय अधिकारी सैद अल-जमाल के साथ मिलकर काम किया और ईरानी तेल की तस्करी में उनकी सहायता की। रिपोर्ट में बताया गया कि "नादिया" नाम का एक जहाज, जो बराड़ के नियंत्रण में था, इस अवैध गतिविधि में शामिल था और इसका इस्तेमाल तेल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक गुप्त तरीके से पहुंचाने में किया गया।
इस पूरे ऑपरेशन को सफलतापूर्वक अंजाम देने के लिए बराड़ के टैंकर जहाजों में विशेष रणनीति अपनाई जाती थी।
इन जहाजों की पहचान से बचने के लिए स्वचालित पहचान प्रणाली (AIS) को बंद कर दिया जाता था, जिससे ये किसी भी समुद्री निगरानी रडार की पकड़ में नहीं आते थे। इन टैंकरों की मदद से समुद्र के बीचोबीच बड़े टैंकरों से तेल को छोटे टैंकरों में लोड कर अन्य ठिकानों तक भेजा जाता था। यह तकनीक न केवल प्रतिबंधों से बचने की कोशिश थी बल्कि तेल की तस्करी के एक संगठित रूप की तरफ भी इशारा करती है।
अमेरिकी प्रतिबंधों के तहत अब बराड़ और उनकी कंपनियां अमेरिका के किसी भी व्यवसाय से सीधे या परोक्ष रूप से जुड़ नहीं सकेंगी। इसके अलावा, जो भी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इन कंपनियों के साथ व्यापार करेंगी, उन पर भी दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
इस कार्रवाई को अमेरिका की वैश्विक प्रतिबंध नीति के तहत एक अहम कदम माना जा रहा है, जो दर्शाता है कि प्रतिबंधों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ अमेरिका किसी भी हद तक जा सकता है।
यह मामला एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उस बहस को जन्म देता है जिसमें वैश्विक व्यापार, प्रतिबंध, भू-राजनीतिक प्रभाव और सुरक्षा चिंताओं के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती बन चुका है।





