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तमिलनाडु के राज्यपाल को सुप्रीम कोर्ट की फटकार, 10 विधेयकों पर रोक अवैध

अदालत ने इस प्रक्रिया को "अवैध और त्रुटिपूर्ण" करार देते हुए ऐसे किसी भी कदम को रद्द करने का आदेश दिया, जिसमें राज्यपाल ने विधेयकों को राष्ट्रपति के पास |

तमिलनाडु के राज्यपाल को सुप्रीम कोर्ट की फटकार, 10 विधेयकों पर रोक अवैध
फोटो: तमिलनाडु के राज्यपाल को सुप्रीम कोर्ट की फटकार, 10 विधेयकों पर रोक अवैध
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को तमिलनाडु के राज्यपाल डॉ. आरएन रवि के व्यवहार को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि विधानसभा द्वारा पारित 10 विधेयकों को स्वीकृति देने में की गई देरी संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है। अदालत ने इस प्रक्रिया को "अवैध और त्रुटिपूर्ण" करार देते हुए ऐसे किसी भी कदम को रद्द करने का आदेश दिया, जिसमें राज्यपाल ने विधेयकों को राष्ट्रपति के पास सुरक्षित रखने की सिफारिश की थी।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके प्रमुख एम.के. स्टालिन ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए इसे "ऐतिहासिक और सभी राज्यों के लिए एक महत्वपूर्ण जीत" बताया। उन्होंने कहा, "यह निर्णय केवल तमिलनाडु के लिए नहीं, बल्कि भारत के सभी राज्यों की लोकतांत्रिक स्वायत्तता की जीत है। डीएमके राज्य के अधिकारों और संघीय ढांचे की रक्षा के लिए अपना संघर्ष जारी रखेगी — और जीतती रहेगी।"


लंबित विधेयकों पर राष्ट्रपति की मंजूरी भी घोषित हुई अमान्य


इन दस विधेयकों में से कुछ जनवरी 2020 से राज्यपाल की मंजूरी के इंतजार में थे। जब राज्य विधानसभा ने उन्हें दोबारा पारित कर भेजा, तब राज्यपाल ने उन्हें राष्ट्रपति के पास सुरक्षित रखने की सिफारिश की। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि ऐसा करना न केवल संवैधानिक योजना के विपरीत है, बल्कि इससे राज्यपाल की निष्पक्षता और सद्भावना पर भी प्रश्नचिह्न लगता है। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि भारत के संविधान में "पूर्ण वीटो" या "पॉकेट वीटो" जैसी कोई अवधारणा नहीं है। न्यायमूर्ति पारदीवाला द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया,  “अनुच्छेद 200 के अंतर्गत राज्यपाल के पास केवल तीन विकल्प होते हैं—मंजूरी देना, मंजूरी रोकना, या राष्ट्रपति के पास आरक्षित करना। लेकिन यह आरक्षण केवल विधेयक के पहले चरण में ही किया जा सकता है।”

कोर्ट ने दो टूक कहा कि जब कोई विधेयक विधानसभा द्वारा दोबारा पारित कर भेजा जाता है, तब राज्यपाल को उसमें मंजूरी देना अनिवार्य होता है। यदि राज्यपाल ऐसे विधेयकों को पुनः राष्ट्रपति के पास भेजते हैं, तो वह संवैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपालों द्वारा विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए स्पष्ट समयसीमाएं निर्धारित कीं, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति न उत्पन्न हो। इसमें तीन प्रमुख निर्देश शामिल हैं: यदि विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजा जाना है, तो एक माह के भीतर निर्णय लिया जाए। यदि राज्य सरकार की सलाह के विपरीत निर्णय लिया जाना हो, तो तीन माह के भीतर। दोबारा पारित विधेयकों को एक माह के भीतर मंजूरी दी जाए।

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