हालांकि, सरकार की इस सोच और रणनीति को उन इलाकों में जबरदस्त विरोध झेलना पड़ रहा है, जहां से ये खनिज निकलते हैं—खासकर बलूचिस्तान और गिलगित-बाल्टिस्तान जैसे संवेदनशील और संसाधन-समृद्ध क्षेत्र।
बलूचों का आरोप है कि दशकों से उनके इलाकों में मौजूद तांबा, सोना, कोयला, प्राकृतिक गैस और अन्य खनिजों को निकाला जा रहा है, लेकिन न तो उन्हें उसका कोई आर्थिक लाभ मिला है और न ही उनके क्षेत्र में कोई विकास हुआ है। उनका कहना है कि इन खनिजों से अर्जित राजस्व का अधिकतर हिस्सा पंजाब और इस्लामाबाद जैसे ताकतवर क्षेत्रों के विकास में खर्च किया जाता है, जबकि बलूचिस्तान में आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं बेहद बदहाल हैं।
बलूच नागरिकों और नेताओं का कहना है कि एक तरफ उनके पहाड़ों और ज़मीन को लूटने की तैयारी की जा रही है, वहीं दूसरी ओर वहां के बच्चे भूख, बीमारी और बेरोजगारी से जूझ रहे हैं। रेको डिक खदान—जो दुनिया की सबसे बड़ी तांबा और सोना खदानों में गिनी जाती है—को लेकर पहले ही तनाव बना हुआ है। अब विदेशी निवेशकों को आमंत्रित कर सरकार ने स्थानीय लोगों की चिंता और गुस्से को और भड़का दिया है।
बलूच नेताओं का मानना है कि सरकार एक बार फिर बिना स्थानीय लोगों की सहमति के, उनके संसाधनों का सौदा कर रही है और उन्हें इसका कोई हक नहीं दिया जा रहा। एक बुजुर्ग बलोच ने मीडिया से बातचीत में गुस्से से कहा, “हमारे पहाड़ों का खजाना बाहर जा रहा है और हमारे घरों में चूल्हे ठंडे हैं। यह लूट अब और नहीं सहेगा बलूचिस्तान।”
इसी तरह पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान में भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। वहां की जनता भी लंबे समय से संसाधनों पर अधिकार और राजनीतिक स्वायत्तता की मांग कर रही है। हाल ही में जब यह सामने आया कि क्षेत्र में मौजूद गोल्ड और यूरेनियम जैसी खनिज संपदा को चीनी कंपनियों को लीज़ पर दिया जा रहा है, तो असंतोष ने एक बार फिर उग्र रूप धारण कर लिया।
पीओके (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर) के पूर्व प्रधानमंत्री सरदार अतीक अहमद खान ने इस मुद्दे पर स्पष्ट शब्दों में कहा, “हमारे हिस्से में सिर्फ धूल बचती है, और हमारे संसाधन लूटकर विदेशी कंपनियों की जेब में भर दिए जाते हैं। हमें हमारे अधिकार चाहिए, सिर्फ वादे नहीं।” उन्होंने यह भी मांग की कि गिलगित-बाल्टिस्तान और पीओके के लोगों को अपने प्राकृतिक संसाधनों पर पूर्ण नियंत्रण और निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी जाए।
इस पूरे घटनाक्रम ने पाकिस्तान में एक बार फिर प्रांतीय असमानता, संसाधनों की केंद्रीकृत लूट और सत्ता के पंजाबी वर्चस्व पर गहन बहस छेड़ दी है।
बलूचिस्तान में तो यह नाराज़गी वर्षों से हिंसक विद्रोहों और सैन्य कार्रवाइयों का कारण बनती रही है। वहां की जनता का यह कहना कि उन्हें देश के निर्माण से अब तक सिर्फ उपेक्षा, शोषण और सैन्य दमन ही मिला है, इस असंतोष की गहराई को दर्शाता है।
ऐसे में जब पाकिस्तान आर्थिक संकट से गुजर रहा है और विदेशी कर्ज के बोझ तले दबा है, यह जरूरी है कि वह अपने संसाधनों को बेचने या लीज पर देने से पहले संबंधित क्षेत्रों की जनता को विश्वास में ले, उन्हें हिस्सा दे और वहां के विकास की ठोस योजना बनाए। अन्यथा, यह खनिज संपदा, जिसे वह समृद्धि का ज़रिया मान रहा है, असंतोष, विद्रोह और विभाजन की नींव बन सकती है।
अगर आप चाहें, तो इस पर एक विस्तृत विश्लेषणात्मक लेख या संपादकीय भी तैयार किया जा सकता है।





