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निजीकरण के बाद भी बिजली विभाग में मौजूद रहेगी आरक्षण व्यवस्था- योगी के मंत्री का दावा, एसोसिएशन ने झूठा ठहराया

यूपी में बिजली कंपनियों के निजीकरण के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे पावर ऑफिसर्स एसोसिएशन ने ऊर्जा मंत्री एके शर्मा के विधान परिषद में दिए गए बयान पर तीखी |

निजीकरण के बाद भी बिजली विभाग में मौजूद रहेगी आरक्षण व्यवस्था- योगी के मंत्री का दावा, एसोसिएशन ने झूठा ठहराया
फोटो: Yogi's minister's claim
यूपी में बिजली कंपनियों के निजीकरण के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे पावर ऑफिसर्स एसोसिएशन ने ऊर्जा मंत्री एके शर्मा के विधान परिषद में दिए गए बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। एसोसिएशन ने मंत्री के बयान को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं, जिसमें उन्होंने यह दावा किया था कि बिजली कंपनियों के निजीकरण के बावजूद आरक्षण व्यवस्था लागू रहेगी। एसोसिएशन का कहना है कि यह आश्वासन पूरी तरह से झूठा है, और इससे केवल कर्मचारियों के बीच भ्रम फैल रहा है। 

 एसोसिएशन के कार्यकारी अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि आरक्षण एक केंद्रीय विषय है, और जब तक संसद से निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने का कानून नहीं बनता, तब तक ऊर्जा मंत्री को सदन में इस मुद्दे पर झूठी बातें नहीं करनी चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल किया कि नोएडा पावर कंपनी लिमिटेड (एनपीसीएल) में आरक्षण व्यवस्था क्यों लागू नहीं है, जबकि मंत्री के बयान के अनुसार इसे निजीकरण के बाद भी लागू किया जाना चाहिए था। एसोसिएशन ने यह भी बताया कि उत्तर प्रदेश में 1993 में निजीकरण का पहला प्रयोग एनपीसीएल के जरिए हुआ था, लेकिन वहां आज तक आरक्षण प्रावधान लागू नहीं किए गए हैं। 

इसके अलावा, मुंबई, चंडीगढ़ और ओडिशा जैसे अन्य राज्यों में भी निजीकरण के बाद आरक्षण लागू नहीं किया गया। ऐसे में, एसोसिएशन का आरोप है कि ऊर्जा मंत्री केवल यह झूठ बोलकर कर्मचारियों के बीच भ्रम फैला रहे हैं। एसोसिएशन के अध्यक्ष आरपी केन ने कहा कि यूपी में दक्षिणांचल और पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के 42 जिलों में निजीकरण होने से लगभग 16,000 आरक्षित पद समाप्त हो जाएंगे, जिससे कई कर्मचारियों की नौकरियां प्रभावित होंगी। उन्होंने यह भी कहा कि अगर राज्य सरकार और ऊर्जा मंत्री आरक्षण को लेकर गंभीर हैं, तो उन्हें केंद्र सरकार को एक प्रस्ताव भेजकर निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने के लिए कानून बनाने की मांग करनी चाहिए। 

एसोसिएशन का यह भी मानना है कि अगर राज्य सरकार निजीकरण के बाद आरक्षण की व्यवस्था को सुनिश्चित करने में गंभीर है, तो उन्हें इस दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए और सिर्फ शब्दों के बजाय सही कार्रवाई करनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है, तो यह राज्य के कर्मचारियों और उनके अधिकारों के साथ धोखा होगा।

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