अब मैं पीएम मोदी को भी चुनौती दे सकता हूं।"
रेड्डी ने बीजेपी नीत केंद्र सरकार पर हमला करते हुए सवाल किया कि अगर हिंदी को इतना बढ़ावा दिया जा रहा है, तो तेलुगु और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के लिए सरकार ने क्या कदम उठाए हैं? उन्होंने यह भी साफ किया कि उनका हिंदी के खिलाफ कोई विवाद नहीं है, लेकिन उनका विरोध हिंदी को अन्य भाषाओं पर थोपने के तरीके को लेकर है। उन्होंने कहा, "हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा नहीं है। अगर इसे वैकल्पिक रूप से बढ़ावा दिया जाए तो ठीक है, लेकिन क्यों इसे हम पर थोपने की कोशिश की जा रही है?"
मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने सिविल सेवा परीक्षा से तेलुगु को हटा दिया है, जो उनके अनुसार क्षेत्रीय भाषाओं के प्रति सरकार की उदासीनता को दर्शाता है। रेड्डी ने यह भी कहा कि, "मैंने हिंदी सीखी और आज इसका प्रयोग भी कर रहा हूं, लेकिन तेलुगु दूसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है।
इसके लिए भी समान प्रयास किए जाने चाहिए।"
यह विवाद तब उभरा जब बीजेपी पर दक्षिण भारत में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए दबाव डालने के आरोप लगे। रेड्डी ने स्पष्ट रूप से कहा कि भाषाई विविधता का सम्मान किया जाना चाहिए और क्षेत्रीय भाषाओं को भी बराबरी के अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने केंद्र सरकार से यह अपेक्षाएं जताई कि हिंदी को बढ़ावा देने के साथ-साथ, क्षेत्रीय भाषाओं को भी समान महत्व दिया जाए।
रेड्डी के इस बयान ने सोशल मीडिया पर व्यापक बहस शुरू कर दी है, जहाँ लोग उनके तंज और भाषा नीति पर उनके रुख की सराहना भी कर रहे हैं और आलोचना भी। इस बयान ने भारतीय राजनीति में एक नई बहस को जन्म दिया है, जहां लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या भाषाई विविधता का सम्मान सही तरीके से किया जा रहा है या नहीं।
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