जस्टिस दीक्षित ने यह भी कहा कि जब हम भारतीय समाज की सामाजिक संरचना को देखते हैं, तो हम पाते हैं कि विभिन्न समाजों और जातियों के बीच एक परस्पर सम्मान और सहयोग की भावना रही है। उन्होंने उदाहरण के तौर पर वेद व्यास और वाल्मीकि का जिक्र किया, जिनका जन्म साधारण परिवारों में हुआ था, लेकिन उनका योगदान भारतीय संस्कृति में अभूतपूर्व था। उन्होंने कहा, "वेद व्यास और वाल्मीकि ने अपने समय की परिधियों को पार कर भारतीय समाज में नया दृष्टिकोण पेश किया, और यही भारतीय संस्कृति की सशक्तता की पहचान है।"
इस बात को भी स्पष्ट करते हुए जस्टिस दीक्षित ने बताया कि संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी में तीन प्रमुख ब्राह्मणों का योगदान न केवल संविधान के निर्माण तक सीमित रहा, बल्कि उन्होंने भारतीय लोकतंत्र के निर्माण में भी अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि यदि हम संविधान के महत्व को समझते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि यह एक जीवंत दस्तावेज़ है, जो समाज की समृद्धि और न्याय की दिशा में लगातार सुधार की ओर अग्रसर है।
जस्टिस दीक्षित ने अपने भाषण में यह भी बताया कि भारत में ब्राह्मणों के योगदान को केवल एक समुदाय विशेष के रूप में नहीं देखा जा सकता। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कई भारतीय समाज सुधारक और राष्ट्रीय नेता, जैसे कि महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू, जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वे भी ब्राह्मण समाज के योगदान को लेकर पूरी तरह से जागरूक थे। गांधीजी ने ब्राह्मणों को सामाजिक सुधारों में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया, और उनका मानना था कि ब्राह्मणों का ज्ञान और शिक्षा समाज के सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
इसके साथ ही, जस्टिस दीक्षित ने कहा कि ब्राह्मणों के योगदान को सही संदर्भ में समझने की जरूरत है। आजकल कुछ लोग ब्राह्मणों को केवल एक जाति के रूप में देखना चाहते हैं, जबकि वास्तव में यह एक वर्ण है, जो पूरी भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि जो लोग ब्राह्मणों के योगदान को नकारते हैं, वे भारतीय समाज और उसकी विरासत की वास्तविकता से अनजान हैं।
अंत में, जस्टिस दीक्षित ने ब्राह्मण समाज को एक ऐसे समाज के रूप में पहचाना जो न केवल अपनी धार्मिक और सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाता है, बल्कि उसने भारतीय समाज को कई दृष्टियों से समृद्ध किया है। उन्होंने कहा, "ब्राह्मण समाज ने हमेशा भारतीय संस्कृति को समृद्ध किया है और उन्होंने हर स्तर पर भारतीय समाज के विकास में योगदान दिया है। यह समय है कि हम उनके योगदान को पूरी तरह से सम्मानित करें और उनकी भूमिका को स्वीकारें।"
इस कार्यक्रम में भाग लेते हुए जस्टिस वी. श्रीशानंद ने भी ब्राह्मण समाज की महिमा पर प्रकाश डाला और कहा कि ब्राह्मणों ने भारतीय समाज को दिशा दी है और उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता। उन्होंने विशेष रूप से भारतीय इतिहास, दर्शन, साहित्य और संस्कृति में ब्राह्मणों की महत्वपूर्ण भूमिका की सराहना की।
इस कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि भारतीय समाज के प्रत्येक वर्ग और समुदाय का योगदान समान रूप से महत्वपूर्ण है और सभी को अपने इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर पर गर्व होना चाहिए। जस्टिस दीक्षित और श्रीशानंद के विचारों से यह स्पष्ट हुआ कि ब्राह्मण समाज ने न केवल भारतीय संविधान के निर्माण में योगदान दिया, बल्कि भारतीय समाज को सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी मजबूत किया।
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