महाराष्ट्र में रेवड़ी संस्कृति पर संकट?
दिल्ली में मुफ्त योजनाओं का असर कमजोर पड़ने के साथ ही महाराष्ट्र में भी महायुति सरकार के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस कई कल्याणकारी योजनाओं को सुचारू रूप से जारी रखने में कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं, खासकर वे योजनाएं जिनमें मुफ्त सुविधाओं का प्रावधान था।
बुजुर्गों को तीर्थ यात्रा पर ले जाने की योजना हो या महिलाओं के खातों में सीधा आर्थिक लाभ पहुंचाने की योजना—राज्य सरकार का बिगड़ा बजट इन योजनाओं के सामने एक बड़ी बाधा बन गया है।
मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना, जिसे जून 2024 में शुरू किया गया था और जिसे चुनावों में महायुति की जीत का एक प्रमुख कारण माना गया था, अब सरकार के लिए सिरदर्द साबित हो रही है।
राज्य के वित्त विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि सरकार अपने खर्चों में कटौती करने पर जोर दे रही है, जिसके चलते कई योजनाओं की समीक्षा की जा रही है और कुछ को अस्थायी रूप से रोक दिया गया है।
अर्थव्यवस्था पर दबाव: अयोध्या यात्रा में देरी
राज्य सरकार की वित्तीय स्थिति इतनी चुनौतीपूर्ण हो गई है कि अयोध्या तीर्थ यात्रा के लिए 25 करोड़ रुपये का फंड जुटाना भी मुश्किल हो रहा है। इसी योजना के तहत बुजुर्गों के एक जत्थे को अयोध्या भेजा जाना था, लेकिन बार-बार देरी हो रही है।
इस योजना की निगरानी कर रहे राज्य के सोशल वेलफेयर कमिश्नर ओमप्रकाश ने हालांकि स्पष्ट किया है कि देरी का मुख्य कारण महाकुंभ है। उन्होंने कहा कि अयोध्या यात्रा की 13 ट्रिप महाकुंभ के कारण टल गई हैं, लेकिन इसके समाप्त होते ही नई तारीखें तय कर दी जाएंगी। इसी योजना के तहत पुरी यात्रा की भी तैयारी की जा रही थी, लेकिन वह भी फिलहाल अटकी हुई है।
यह आर्थिक संकट केवल तीर्थ यात्रा योजना तक सीमित नहीं है। शिव भोजन थाली योजना और अनंदचा शिधा योजना जैसी अन्य कल्याणकारी योजनाएं भी प्रभावित हुई हैं। इन योजनाओं के तहत गरीबों को रियायती दरों पर भोजन और आवश्यक राशन उपलब्ध कराया जाता है, लेकिन वित्तीय संसाधनों की कमी के चलते अब इन योजनाओं पर भी संकट मंडरा रहा है।
2024 के चुनाव से पहले, जुलाई से अक्टूबर के बीच करीब 6,424 बुजुर्गों को अयोध्या भेजा गया था, लेकिन चुनावी जीत के बाद से महायुति सरकार केवल 800 लोगों के एक जत्थे को बिहार के गया भेज पाई है। आगामी 13 अयोध्या यात्राओं और 1 पुरी यात्रा की योजना तो बनी हुई है, लेकिन वर्तमान में सब कुछ ठप पड़ा है।
दिल्ली में मुफ्त योजनाओं की कीमत: कर्ज में डूबती राजधानी
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार के कार्यकाल के दौरान, मुफ्त योजनाओं पर अत्यधिक निर्भरता ने राज्य की वित्तीय स्थिति को कमजोर कर दिया था।
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि केवल मुफ्त बिजली योजना पर हर साल 3,600 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे थे। इसी तरह, पानी पर सब्सिडी देने में 500 करोड़ रुपये सालाना खर्च हो रहे थे, जबकि महिलाओं को दी जा रही मुफ्त बस सेवा पर 440 करोड़ रुपये का वार्षिक खर्च था।
इन योजनाओं से वोट तो मिल रहे थे, लेकिन दिल्ली की अर्थव्यवस्था पर इसका भारी असर पड़ा। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली का कर्ज लगातार बढ़ता गया।
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