मुंबई के अलावा चेन्नई को भी खतरा
सीएसटीईपी की रिपोर्ट में अंदेशा जताया गया है कि अगले 16 वर्षों में मुंबई के अलावा चेन्नई का 7.3 फीसदी यानी 86.8 वर्ग किलोमीटर हिस्सा भी पानी में डूबा होगा। यह आंकड़ा सदी के अंत तक बढ़कर 18 फीसदी (215.77 वर्ग किलोमीटर) से ज्यादा हो जाएगा। इसी तरह 2040 तक यनम और थूथुकुड़ी का करीब दस फीसदी हिस्सा पानी में डूब जाएगा। पणजी और चेन्नई में यह आंकड़ा पांच से दस फीसदी के बीच रहने का अंदेशा है। वहीं समुद्र का बढ़ता जलस्तर कोच्चि, मैंगलोर, विशाखापत्तनम, हल्दिया, उडुपी, पारादीप और पुरी में एक से पांच फीसदी जमीन को खत्म कर सकता है।
यदि उच्च उत्सर्जन की दिशा में देखें तो सदी के अंत मुंबई और चेन्नई की तुलना में मैंगलोर, हल्दिया, पारादीप, थूथुकुडी और यनम में कहीं ज्यादा जमीन पानी में डूब चुकी होगी। इस रिपोर्ट में सीएसटीईपी ने देश के 15 तटीय शहरों और कस्बों में समुद्र के बढ़ते जलस्तर का आंकलन किया है। इनमें विशाखापत्तनम, पणजी, मंगलौर, उडुपी, कोचीन, कोझिकोड, तिरुवनंतपुरम, मुंबई, पाराद्वीप, पुरी, यनम, चेन्नई, कन्याकुमारी, तूतीकोरिन और हल्दिया शामिल हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक 1987 से 2021 के बीच मुंबई में समुद्र के जलस्तर में सबसे ज्यादा वृद्धि दर्ज की गई, जो 4.44 सेंटीमीटर रही। इसके बाद हल्दिया में 2.726 सेंटीमीटर, विशाखापत्तनम में 2.381 सेंटीमीटर, कोच्चि में 2.213 सेंटीमीटर, पारादीप में 0.717 सेंटीमीटर और चेन्नई के जलस्तर में 0.679 सेंटीमीटर की वृद्धि देखी गई है।
कृषि, वन और जैव विविधता पर भी होगा असर
रिपोर्ट में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि समुद्र के बढ़ते जलस्तर से जलापूर्ति, कृषि, वन और जैव विविधता के साथ-साथ स्वास्थ्य क्षेत्र पर भी असर पड़ सकता है। इसी तरह समुद्र तटों के साथ बैकवाटर और मैंग्रोव विशेष रूप से जोखिम में हैं। इसका सीधा असर जैव विविधता और पर्यटन पर भी पड़ेगा। आशंका है कि हल्दिया, उडुपी, पणजी और यनम में कृषि क्षेत्र, आद्रभूमियां और जलस्रोत बढ़ते जलस्तर की भेंट चढ़ सकते हैं।
वैश्विक स्तर पर देखें तो जिस तरह से तापमान में इजाफा हो रहा है, उसके साथ समुद्र का जल स्तर भी तेजी से बढ़ रहा है। कहीं न कहीं समुद्री जल के बढ़ते तापमान की वजह से यह समस्या कहीं ज्यादा गंभीर रूप लेती जा रही है। इसके साथ ही पहाड़ों पर जमा बर्फ और ग्लेशियरों के पिघलने की वजह से भी जलस्तर में इजाफा हो रहा है।





