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आरएसएस को सम्मानित करने और सिक्के पर बवाल, कांग्रेस और CPIM ने उठाए सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में एक विशेष स्मारक सिक्का और डाक टिकट जारी करने के फैसले

आरएसएस को सम्मानित करने और सिक्के पर बवाल, कांग्रेस और CPIM ने उठाए सवाल
फोटो: Naredramodi RSS
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में एक विशेष स्मारक सिक्का और डाक टिकट जारी करने के फैसले को लेकर कई लोगों ने नाराज़गी जताई है। कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी CPI(M) ने इस कदम को संविधान के मूल्यों के खिलाफ बताया है और प्रधानमंत्री पर इतिहास को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने का आरोप लगाया है।

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर सरदार वल्लभभाई पटेल के 1948 में लिखे गए पत्रों का हवाला देते हुए आरएसएस की आलोचना की है। उन्होंने एक पत्र का अंश साझा किया जिसमें पटेल ने लिखा था कि आरएसएस और हिंदू महासभा की गतिविधियों ने देश में ऐसा माहौल बनाया जिसमें गांधीजी की हत्या जैसी त्रासदी संभव हो सकी थी। रमेश ने यह भी याद दिलाया कि पटेल ने जयपुर में एक जनसभा में कहा था कि सरकार किसी भी सांप्रदायिक संगठन को देश को गुलामी या विघटन की ओर नहीं ले जाने देगी।

वहीं CPI(M) ने सिक्के पर भारत माता की छवि और डाक टिकट पर 1963 गणतंत्र दिवस परेड में आरएसएस स्वयंसेवकों की तस्वीर को लेकर आपत्ति जताई। पार्टी का कहना है कि यह ऐतिहासिक तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत करता है, क्योंकि उस परेड में आरएसएस की भागीदारी यदि थी भी, तो वह मामूली और अप्रतिबंधित थी। पार्टी ने आरोप लगाया कि सरकार आरएसएस के अतीत को सफेद करने की कोशिश कर रही है, जबकि यह संगठन स्वतंत्रता संग्राम से दूर रहा और ब्रिटिश शासन की “फूट डालो और राज करो” नीति को मजबूत करता रहा है।

CPI(M) ने यह भी आरोप लगाया कि आरएसएस का इतिहास सांप्रदायिक हिंसा से जुड़ा रहा है और आज भी यह संगठन अल्पसंख्यकों और हाशिए पर खड़े समुदायों को निशाना बना रहा है। पार्टी महासचिव एम.ए. बेबी ने कहा कि प्रधानमंत्री का यह कदम उनके संवैधानिक पद की गरिमा को ठेस पहुंचाता है और भारत के स्वतंत्रता संग्राम को विकृत करता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने समारोह में आरएसएस की राष्ट्र निर्माण में भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि संगठन ने स्वतंत्रता संग्राम में योगदान दिया और इसके नेताओं ने बलिदान दिए। मोदी ने यह भी कहा कि आरएसएस ने हमेशा राष्ट्र को प्राथमिकता दी है और झूठे आरोपों व प्रतिबंधों के बावजूद कभी कटुता नहीं रखी है। जबकि स्मारक सिक्के पर आरएसएस का आदर्श वाक्य “राष्ट्राय स्वाहा, इदं राष्ट्राय, इदं न मम” अंकित है, जिसका अर्थ है “सब कुछ राष्ट्र को समर्पित है, सब कुछ राष्ट्र का है, मेरा कुछ नहीं।” डाक टिकट में 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में आरएसएस स्वयंसेवकों की भागीदारी को दर्शाया गया है, जिसे सरकार ने संगठन के ऐतिहासिक योगदान के रूप में प्रस्तुत किया।इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर आरएसएस की भूमिका और उसके इतिहास को लेकर राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है, जिसमें संविधान, स्वतंत्रता संग्राम और सांप्रदायिकता जैसे मुद्दे केंद्र में हैं। लेकिन इतिहास क्या कहता है एक नज़र तथ्यों पर भी डालते है।

फ्रंटलाइन (Frontline) की रिपोर्ट के अनुसार, महात्मा गांधी की हत्या में नाथूराम गोडसे के आरएसएस से संबंध को लेकर जो दावा किया जाता है कि वह उस समय संगठन से जुड़ा नहीं था। वह ऐतिहासिक तथ्यों से मेल नहीं खाता। वरिष्ठ लेखक ए.जी. नूरानी ने अपने विश्लेषण में स्पष्ट रूप से कहा है कि गोडसे आरएसएस का सदस्य था और उसने संगठन की विचारधारा को पूरी तरह अपनाया था।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि गोडसे ने गांधी की हत्या किसी संगठनात्मक आदेश पर नहीं की, लेकिन उसने आरएसएस की कट्टर राष्ट्रवादी और सांप्रदायिक सोच को आत्मसात किया था। नूरानी लिखते हैं कि “कोई यह नहीं कहता कि आरएसएस की केंद्रीय कार्यकारिणी ने गांधी की हत्या का आदेश दिया था, लेकिन यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि गोडसे संगठन का सदस्य था और उसकी सोच आरएसएस की नफरत और हिंसा की विचारधारा से मेल खाती थी।”

फ्रंटलाइन के अनुसार, सरदार वल्लभभाई पटेल ने भी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखे पत्र में यह स्वीकार किया था कि आरएसएस की गतिविधियों ने ऐसा माहौल बनाया जिसमें गांधी की हत्या संभव हुई। इस आधार पर रिपोर्ट यह निष्कर्ष निकालती है कि संगठन अपने सदस्य की उस घातक कार्रवाई से पूरी तरह अलग नहीं हो सकता। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि आरएसएस ने गोडसे से अपने संबंधों को नकारने की कोशिश की, लेकिन उसके भाई गोपाल गोडसे ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि वे सभी भाई आरएसएस से जुड़े थे। यह बयान कई बार मीडिया में सामने आया है और इतिहासकारों ने भी इसे प्रमाणिक माना है।

हालांकि आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने भी इस अवसर पर कहा कि संगठन को लेकर कई भ्रांतियाँ फैलाई गई हैं, जबकि संघ ने शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा राहत और सामाजिक समरसता के क्षेत्र में दशकों से काम किया है। उन्होंने यह भी कहा कि 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में स्वयंसेवकों की भागीदारी ऐतिहासिक थी और इसे डाक टिकट में दर्शाना संगठन के योगदान को मान्यता देने जैसा है। आरएसएस ने गांधी हत्या में अपनी भूमिका से हमेशा इनकार किया है। संगठन का कहना है कि नाथूराम गोडसे ने बहुत पहले संघ छोड़ दिया था और उसकी कार्रवाई संघ की विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करती। संघ का यह भी दावा है कि उसने कभी हिंसा का समर्थन नहीं किया और उसका उद्देश्य सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के माध्यम से समाज को संगठित करना रहा है।

RSS विवादों में क्यों रहता है


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही विवादों से भरा भी रहा है। इसकी स्थापना 1925 में नागपुर में हुई थी, लेकिन आज तक इसे लेकर कई सवाल उठते हैं। एक बड़ा विवाद यह रहा कि संघ ने लंबे समय तक अपने मुख्यालय पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा नहीं फहराया। 2001 में जब कुछ लोग गणतंत्र दिवस पर झंडा फहराने पहुंचे, तो उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। इससे यह सवाल उठा कि जो संगठन खुद को राष्ट्रभक्ति का प्रतीक बताता है, वह तिरंगे से दूरी क्यों बनाए रखता है।

गांधी जी की हत्या के बाद भी संघ पर प्रतिबंध लगा था, क्योंकि हत्यारे नाथूराम गोडसे का संघ से जुड़ाव बताया गया था। हालांकि संघ ने इससे इनकार किया, लेकिन उस समय की सरकार ने इसे गंभीरता से लिया। इसके अलावा संघ की हिंदू राष्ट्र की सोच को लेकर भी विवाद रहा है। कई लोग मानते हैं कि यह सोच देश के बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक स्वरूप के खिलाफ है। अल्पसंख्यक समुदायों को लगता है कि संघ की विचारधारा उन्हें हाशिए पर डालती है।

संघ का भारतीय जनता पार्टी से गहरा रिश्ता भी विवादों का कारण बना है। भले ही RSS खुद को गैर-राजनीतिक संगठन कहता है, लेकिन इसके कई सदस्य भाजपा में सक्रिय हैं और नीति निर्धारण में भूमिका निभाते हैं। शिक्षा, इतिहास और संस्कृति को लेकर संघ की मांगें भी कई बार बहस का विषय बनी हैं, जैसे स्कूलों की किताबों में बदलाव या मुगलों की भूमिका को कम करके दिखाना है। इन सब कारणों से RSS का नाम बार-बार विवादों में आता है। समर्थक इसे देशभक्ति और सेवा का प्रतीक मानते हैं, जबकि आलोचक इसे एकपक्षीय सोच और बहुसंख्यकवाद का प्रतिनिधि कहते हैं। यही वजह है कि संघ का इतिहास आज भी बहस और टकराव का हिस्सा बना हुआ है।

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