अमेरिका-ईरान युद्ध
विश्लेषकों के अनुसार अमेरिका-ईरान युद्ध के परिदृश्य में भारत ने पारंपरिक ‘सुपरपावर बनाम सुपरपावर’ ढांचे से अलग अपनी रणनीति अपनाई। अमेरिका और उसके सहयोगियों ने जहां अपनी सीमाएं दिखाई, वहीं भारत ने किसी भी खेमे में खुद को सीमित नहीं किया। रूस से ऊर्जा खरीद, अमेरिका के साथ सुरक्षा साझेदारी और ईरान के चाबहार पोर्ट में सक्रियता इस बहुआयामी नीति का हिस्सा हैं।
चाबहार पोर्ट व रणनीतिक
चाबहार पोर्ट केवल एक बंदरगाह नहीं है, बल्कि भारत वैश्विक शक्ति और रणनीतिक रूप से जोड़ने वाला राष्ट्र के लिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंच का वैकल्पिक मार्ग भी है। अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत ने इस प्रोजेक्ट को अलग-अलग रूपों में जारी रखा। खाड़ी देशों के साथ संबंध भी इसी ‘कनेक्टिंग पावर’ नीति का हिस्सा हैं। भारत सऊदी अरब और UAE के लिए सिर्फ व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि ऊर्जा, निवेश और श्रम शक्ति का अहम स्रोत भी है।
कनेक्टर पावर की ताकत
विशेषज्ञों के अनुसार भारत पारंपरिक अर्थों में सुपरपावर नहीं है, फिर भी वह वैश्विक कूटनीति में एक अनिवार्य ‘कनेक्टर’ बन चुका है। इसका मतलब है कि भारत किसी पर हावी नहीं होता, लेकिन सभी से जुड़ा रहता है। इसके जरिए वह ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, रक्षा और तकनीकी सहयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
वैश्विक प्रभाव और भविष्य
ईरान-अमेरिका टकराव ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत हर समीकरण में जरूरी है। उसकी रणनीति स्थिरता नहीं, बल्कि प्रासंगिकता पर केंद्रित है। आने वाले समय में वैश्विक व्यवस्था दो हिस्सों में बंट सकती है, वे देश जो जुड़े हुए हैं और वे जो अलग हैं। भारत पहले समूह का नेतृत्व करता नजर आता है।
भारत ने न केवल बहुआयामी संवाद कायम रखा, बल्कि खुद को वैश्विक समाधान में एक ‘कनेक्टिंग मैकेनिज्म’ के रूप में स्थापित किया। यह उसकी सबसे बड़ी ताकत है, जो उसे किसी भी संघर्ष या वैश्विक बदलाव में केंद्रीय भूमिका निभाने योग्य बनाती है।
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