चिदंबरम ने एक बयान में कहा,
"फरवरी 2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में खड़े होकर इस प्रत्यर्पण का श्रेय लेने की कोशिश कर रहे थे, जबकि इसकी नींव तो 2005 में ही रख दी गई थी।"
उन्होंने जोर देकर कहा कि राणा की भूमिका की पुष्टि भारतीय अधिकारियों ने बहुत पहले कर ली थी, जब यह सामने आया था कि उसने लश्कर-ए-तैयबा और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के गुर्गों के साथ समन्वय किया था।
पूर्व गृह मंत्री ने आगे कहा,
"फैक्ट्स बिल्कुल साफ़ हैं—ना तो मोदी सरकार ने इस प्रक्रिया की शुरुआत की और ना ही उसने कोई नई कूटनीतिक सफलता हासिल की। यह पूरी तरह उस रणनीतिक कूटनीति का फल है, जिसे UPA सरकार के समय ईमानदारी और निरंतरता के साथ आगे बढ़ाया गया था।"
उन्होंने जोर दिया कि यह एक दिखावे की जीत नहीं है, बल्कि यह उदाहरण है कि जब कूटनीति, कानून प्रवर्तन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को नाटकबाज़ी से दूर रहकर, ईमानदारी से आगे बढ़ाया जाए, तो भारत किस स्तर पर परिणाम प्राप्त कर सकता है।
राणा का प्रत्यर्पण: एक कानूनी और कूटनीतिक यात्रा
तहव्वुर राणा के खिलाफ भारत ने 2008 से ही कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी थी। 11 फरवरी 2025 को अमेरिकी विदेश मंत्री ने भारतीय अधिकारियों को राणा के प्रत्यर्पण की अनुमति देने वाला आत्मसमर्पण वारंट साइन किया। इसके बाद राणा के वकीलों ने आपातकालीन स्थगन के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन 7 अप्रैल को कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी।
8 अप्रैल को राणा को भारत के लिए रवाना किया गया और 10 अप्रैल को वह नई दिल्ली पहुंचा। यहां NIA (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) ने उसे अपनी हिरासत में लिया।
राणा को लश्कर-ए-तैयबा का सहयोगी और 2008 के मुंबई हमलों का सह-साजिशकर्ता माना गया है। हमलों में 174 से अधिक लोगों की जान गई थी, जिनमें भारतीय नागरिकों के अलावा अमेरिकी और इज़रायली नागरिक भी शामिल थे।
चिदंबरम ने अंत में कहा,
"यह प्रत्यर्पण न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम है, खासकर उन पीड़ित परिवारों के लिए जो 26/11 के बाद से न्याय की राह देख रहे हैं।"
Read This Also:- '16 साल की लड़ाई का नतीजा है तहव्वुर राणा का प्रत्यर्पण' – संजय राउत ने किया कांग्रेस का समर्थन
Read This Also:- '16 साल की लड़ाई का नतीजा है तहव्वुर राणा का प्रत्यर्पण' – संजय राउत ने किया कांग्रेस का समर्थन





