पार्टी ने कहा है कि कांग्रेस अब किसी भी तरह से संवाद स्थापित नहीं कर रही है और INDIA गठबंधन अब पूरी तरह से निष्क्रिय हो चुका है।
उद्धव सेना ने यह भी टिप्पणी की कि इन परिस्थितियों में जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को यह कहना पड़ा कि अगर यही स्थिति बनी रही, तो INDIA गठबंधन को लोकसभा चुनाव तक के लिए ही मान लिया जाए और इसे खत्म कर देना चाहिए। इसके साथ ही, शिवसेना ने अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समय इस गठबंधन में बहुत अच्छा सामंजस्य था, चाहे वह विपक्ष में था या सत्ता में। उस समय गठबंधन के सभी दलों के बीच संवाद बना रहता था, और यदि किसी मुद्दे पर मतभेद होते भी थे, तो उन्हें शीघ्र ही सुलझा लिया जाता था।
इसके अतिरिक्त, शिवसेना ने राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा की भी सराहना की, और कहा कि इससे पार्टी की छवि को एक नया आयाम मिला है।
मल्लिकार्जुन खरगे जैसे वरिष्ठ नेता पार्टी के अध्यक्ष हैं, और प्रियंका गांधी भी अब अधिक सक्रिय रूप से राजनीति में अपनी भूमिका निभा रही हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि INDIA गठबंधन को मजबूत और एकजुट रखने की जिम्मेदारी कौन लेगा?
सामना में आगे कहा गया कि आज कई ऐसे दल हैं जो कभी एनडीए का हिस्सा थे और अब वे INDIA गठबंधन का हिस्सा बने हैं। इनमें से कई दलों के नेताओं को अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व का समय याद है, जब नियमित रूप से मीटिंग्स आयोजित होती थीं, और राज्य स्तरीय दलों से संवाद के लिए प्रमोद महाजन और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता खुद उन राज्यों में जाकर चर्चा करते थे। एनडीए के पास एक मजबूत संयोजक हुआ करता था, और लंबे समय तक जॉर्ज फर्नांडीस जैसे दिग्गज नेता इस भूमिका में थे। इन बैठकों को बहुत सम्मान मिलता था, और कई बार अटल जी या फिर आडवाणी खुद इन बैठकों की अध्यक्षता करते थे।
यह नसीहत उस समय आई है जब उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने खुद कई बार यह कहा है कि वह आगामी निकाय चुनावों में अकेले ही लड़ेगी। इसके अलावा, हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावों में हार के बाद, अब INDIA गठबंधन के नेतृत्व को बदलने की मांग उठने लगी है। कुछ दलों का मानना है कि कांग्रेस की बजाय किसी अन्य दल के नेता को इस गठबंधन का नेतृत्व करना चाहिए। इसी बीच, जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी ईवीएम पर अलग रुख अपनाया है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सराहना की है, जिसके बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या INDIA गठबंधन के भीतर सामूहिक नेतृत्व की आवश्यकता है, या एक सशक्त नेतृत्व की भूमिका को पुनः स्थापित किया जाए।
इस पूरी स्थिति में कांग्रेस की भूमिका को लेकर चिंता बढ़ रही है, और अन्य विपक्षी दलों की ओर से लगातार आलोचना की जा रही है कि कांग्रेस अपने समन्वय और रणनीतिक संवाद में कमजोर साबित हो रही है, जो कि आगामी चुनावों में गठबंधन की सफलता के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
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