नई दिल्ली: पत्रकारिता में 'संतुलन' (Balance) और 'निष्पक्षता' की परिभाषा को लेकर चल रही बहसों के बीच एक वरिष्ठ पत्रकार ने बेबाक राय रखी है। उनका कहना है कि पत्रकारिता में बैलेंस का मतलब यह कतई नहीं है कि आप तथ्यों को दिखाना बंद कर दें या सच को छिपा लें। यदि सामने दिख रहे सच को रिपोर्ट करने से स्टोरी 'इमबैलेंस' होने लगे, तो वह पत्रकारिता की हत्या के समान है।
सत्ता से सवाल पूछना और अंधेरे कोनों को रोशन करना ही पत्रकारिता
वरिष्ठ पत्रकार ने स्पष्ट किया कि रिपोर्टर का काम यह देखना है कि जमीन पर वास्तव में क्या हो रहा है। यदि पुलिस किसी पर लाठीचार्ज कर रही है या अन्याय हो रहा है, तो कैमरा उस सच को कैद करेगा। इसके लिए किसी कमिश्नर से यह पूछना कि "आपने ऐसा क्यों किया" संतुलन के नाम पर लीपापोती करना है। असली पत्रकारिता वही है जो सत्ताधारियों और शक्तिशाली लोगों के उन अंधेरे कोनों को बेनकाब करे और वहां रोशनी लाए।
उन्होंने कहा कि आज सबसे ज्यादा दिक्कत स्वतंत्र और आजाद ख्याल पत्रकारों से है जो चाटुकारिता नहीं करते। यही कारण है कि डिजिटल मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारों को निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि उनकी लगाम किसी कॉरपोरेट या सरकार के हाथ में नहीं है। मुख्यधारा के बड़े मीडिया घरानों के विपरीत स्वतंत्र पत्रकार अपनी खुदमुख्तारी के साथ सच सामने ला रहे हैं।
पत्रकारिता की वफादारी जनता और सत्य के प्रति
पत्रकारिता के भविष्य और उसकी अकाउंटेबिलिटी पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि एक पत्रकार की जवाबदेही सिर्फ और सिर्फ अपनी ऑडियंस, रीडर और सत्य के प्रति होनी चाहिए। भले ही भीड़ या समाज का एक बड़ा हिस्सा किसी भ्रम या पूर्वाग्रह से ग्रसित क्यों न हो, एक सच्चे पत्रकार को हमेशा सच्चाई और उस एक अकेले व्यक्ति के पक्ष में खड़ा होना चाहिए जो इंसाफ की गुहार लगा रहा है।
उन्होंने अंत में चेताया कि यदि पत्रकारों ने अपनी आजादी और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष नहीं किया, तो धीरे-धीरे उनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए विपरीत परिस्थितियों में भी लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए डटकर लड़ना होगा।
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