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जंतर-मंतर विवाद: प्रदर्शन के अधिकार, वोट चोरी और विपक्षी एकता पर उठे सवाल

जंतर-मंतर पर गिरफ्तारी, वोट चोरी के आरोप, विपक्षी एकता और मीडिया की भूमिका को लेकर उठे सवालों ने लोकतांत्रिक बहस तेज की।

जंतर-मंतर विवाद: प्रदर्शन के अधिकार, वोट चोरी और विपक्षी एकता पर उठे सवाल
फोटो: Jantar Mantar Protest | Right to Protest | Vote Chori | Opposition Unity | Media Freedom

दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने पहुंचे CJP (क्रिमिनल जस्टिस प्रोजेक्ट/सिविल सोसाइटी संगठन के रूप में स्क्रिप्ट में उल्लेखित) से जुड़े कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और पांच दिन की न्यायिक हिरासत ने लोकतांत्रिक अधिकारों, पुलिस कार्रवाई और राजनीतिक जवाबदेही को लेकर बहस तेज कर दी है। एक राजनीतिक कार्यक्रम में पत्रकारों ने जंतर-मंतर को दोबारा प्रदर्शन स्थल बनाने, वोट चोरी के आरोपों और विपक्षी दलों की रणनीति पर चर्चा की।

 

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और गिरफ्तारी

कार्यक्रम में बताया गया कि सौरव दास, आशुतोष रांका और अजिंक्य शिंद सहित कार्यकर्ता जंतर-मंतर पहुंचे और वहां तिरंगा फहराया। इसके बाद कुछ लोगों को हिरासत में लिया गया। चर्चा के अनुसार, सौरव दास और आशुतोष रांका को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया, जबकि अन्य लोगों को निजी मुचलके पर छोड़े जाने का उल्लेख किया गया।

वक्ताओं ने बताया कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति और प्रतिबंधों से जुड़े नियमों के उल्लंघन के आरोप में अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज की गईं। इनमें लोक सेवक के आदेश की अवज्ञा, सरकारी काम में बाधा, अतिक्रमण और आपराधिक साजिश से संबंधित धाराओं का जिक्र हुआ। वक्ताओं ने कहा कि कानूनी कार्रवाई संभव होने का अर्थ यह नहीं कि वह नैतिक रूप से भी उचित हो। उन्होंने महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह का उदाहरण देते हुए सवाल उठाया कि अन्यायपूर्ण कानूनों के खिलाफ शांतिपूर्ण अवज्ञा का अधिकार कितना सुरक्षित है।

प्रदर्शन का अधिकार और सरकार की जवाबदेही

चर्चा में जंतर-मंतर को ऐतिहासिक विरोध स्थल बताते हुए कहा गया कि इसे सीमित करना आंदोलन की आवाज को कमजोर करने की कोशिश हो सकती है। वक्ताओं के अनुसार, वोट चोरी के आरोपों की तरह प्रदर्शन का अधिकार भी लोकतंत्र और संविधान से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि जनता को सरकार से जवाब मांगने और नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने का अवसर मिलना चाहिए।

कार्यक्रम में 12 अक्टूबर के विपक्षी प्रदर्शन पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के कथित बयान का भी उल्लेख हुआ। स्क्रिप्ट के अनुसार, शाह ने प्रदर्शन में लगभग 8,000 लोगों के शामिल होने का आंकड़ा बताया था। इसके जवाब में वक्ताओं ने मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए 23,000 से 25,000 केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के जवानों और करीब 15,000 दिल्ली पुलिसकर्मियों की तैनाती का दावा किया। उन्होंने सवाल किया कि यदि भीड़ इतनी छोटी थी, तो इतनी बड़ी सुरक्षा व्यवस्था क्यों की गई। हालांकि, भीड़ और सुरक्षा बलों के आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि कार्यक्रम में प्रस्तुत नहीं की गई।

 

वोट चोरी के आरोप और विपक्षी एकता

चर्चा में 2024 के लोकसभा चुनाव के वोट शेयर का उल्लेख करते हुए कहा गया कि एनडीए को 43.8 प्रतिशत और इंडिया गठबंधन को 41.5 प्रतिशत वोट मिले थे। वक्ताओं ने चुनावी प्रक्रिया पर लगे आरोपों की जांच और दस्तावेजी सबूत सार्वजनिक करने की मांग की। उन्होंने कहा कि केवल चुनाव जीतना सभी नागरिकों के समर्थन का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

आम आदमी पार्टी की भूमिका पर भी सवाल उठे। वक्ताओं ने आशंका जताई कि पंजाब में सरकार बचाने की राजनीतिक मजबूरियां राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता को प्रभावित कर सकती हैं। वहीं, राहुल गांधी द्वारा नेहा बोरा को प्रमुखता देने और विभिन्न आंदोलनों को एक साझा मंच पर लाने की कोशिश का समर्थन किया गया। वक्ताओं का कहना था कि नेहा बोरा ने लंबे समय तक भूख हड़ताल और देशभर में सक्रियता के जरिए अपनी पहचान बनाई है।

 

मीडिया की भूमिका पर सवाल

कार्यक्रम में मुख्यधारा के कुछ टीवी चैनलों पर प्रदर्शनकारियों, पत्रकारों और पुलिस कार्रवाई से जुड़े पहलुओं को पर्याप्त जगह नहीं देने का आरोप लगाया गया। पाकिस्तान से कथित संबंधों और प्रदर्शन में अराजकता फैलाने की साजिश जैसे दावों पर भी सबूत सार्वजनिक करने की मांग की गई। वक्ताओं ने डिजिटल पत्रकारों की भूमिका का बचाव करते हुए कहा कि पत्रकारिता का दायित्व आम लोगों, बेरोजगार युवाओं और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों को सामने लाना है।

अंत में वक्ताओं ने जंतर-मंतर को दोबारा प्रदर्शन स्थल बनाने की मांग को व्यापक लोकतांत्रिक आंदोलन से जोड़ते हुए कहा कि अलग-अलग संगठनों और विपक्षी दलों को आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर नागरिक अधिकारों के सवाल पर साथ आना चाहिए।

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