बैरिकेडिंग, हिरासत और पत्रकारों की रिपोर्टिंग पर रोक के आरोपों के बीच विपक्षी एकजुटता और चुनाव आयोग की जवाबदेही पर बहस तेज
दिल्ली में अक्टूबर के शुरुआती दिनों में हुए विरोध प्रदर्शनों और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में भारी बैरिकेडिंग, प्रदर्शनकारियों की हिरासत और पत्रकारों को रिपोर्टिंग के दौरान आई परेशानियों पर सवाल उठाए गए हैं। ‘नॉ द न्यूज़’ के एक कार्यक्रम में पत्रकार नीरज झा ने इन घटनाओं पर चर्चा करते हुए कहा कि राजधानी में लोकतांत्रिक विरोध को संभालने के तरीके ने पुलिस की भूमिका और सरकार की छवि पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
दिल्ली की सड़कों पर बैरिकेडिंग और हिरासत
कार्यक्रम में चर्चा के मुताबिक, 2 अक्टूबर से शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई लगातार सुर्खियों में रही। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में व्यापक बैरिकेडिंग की गई और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने के लिए पुलिस ने ड्रोन की मदद भी ली।
नीरज झा ने दावा किया कि कई लोगों को बसों में भरकर ले जाया गया और कुछ ऐसे लोग भी हिरासत में लिए गए, जो केवल चाय पीने, सामान खरीदने या दूसरे सामान्य कामों से वहां पहुंचे थे। उन्होंने सवाल उठाया कि भारतीय नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध करने से रोकने के लिए इतनी बड़ी सुरक्षा व्यवस्था क्यों की गई।
चर्चा में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) की तैनाती पर भी सवाल उठाए गए। वक्ताओं के अनुसार, अलग-अलग राज्यों से सुरक्षा बलों को दिल्ली बुलाया गया, जबकि प्रदर्शनकारी चुनावी प्रक्रिया और कथित वोट चोरी के आरोपों पर अपनी आपत्ति दर्ज कराना चाहते थे।
पत्रकारों की रिपोर्टिंग पर रोक के आरोप
कार्यक्रम में पत्रकारों ने बताया कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस की ओर से लोगों को प्रदर्शनकारियों के बीच न जाने की घोषणाएं की गईं। कुछ पत्रकारों ने आरोप लगाया कि उन्हें रिपोर्टिंग करने से रोका गया, उनके पहचान पत्र जांचे गए और उन्हें हिरासत में रखा गया, जबकि कुछ अन्य मीडिया संस्थानों के पत्रकारों को अपेक्षाकृत स्वतंत्र रूप से काम करने दिया गया।
चर्चा में हिरासत के दौरान कथित दुर्व्यवहार, पत्रकारों को पर्याप्त पानी नहीं मिलने और इंटरनेट बंद किए जाने जैसे आरोप भी सामने आए। वक्ताओं ने कुछ वायरल वीडियो का उल्लेख करते हुए पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि कार्यक्रम में प्रस्तुत नहीं की गई।
कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि मानवाधिकार संबंधी एक रिपोर्ट में 10 अक्टूबर की कार्रवाई की आलोचना की गई थी। वहीं, भाजपा सांसद मनोज तिवारी के विरोध प्रदर्शन में विदेशी फंडिंग होने संबंधी कथित बयान पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने इस दावे पर सवाल उठाए।
राहुल गांधी और विपक्षी दलों की एकजुटता
चर्चा का एक प्रमुख मुद्दा राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों और नागरिक समाज के लोगों की भागीदारी रहा। कार्यक्रम में बताया गया कि कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के कई नेता तथा कार्यकर्ता प्रदर्शन में शामिल हुए। अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और अन्य विपक्षी नेताओं की मौजूदगी का भी उल्लेख किया गया।
वक्ताओं के अनुसार, बरखंबा मेट्रो स्टेशन से मंडी हाउस तक बड़ी संख्या में लोग जुटे थे। कार्यक्रम में भीड़ के अनुमान दो लाख से ढाई लाख तक बताए गए, हालांकि इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई।
नीरज झा ने कहा कि इस प्रदर्शन में कांग्रेस की प्रमुख भूमिका थी, लेकिन इसमें अलग-अलग विपक्षी दलों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों की भागीदारी ने व्यापक एकजुटता का संदेश दिया। उनके मुताबिक, राहुल गांधी का यह कहना कि सभी प्रदर्शन एक साझा संघर्ष का हिस्सा हैं, प्रदर्शन की तस्वीरों में भी दिखाई दिया।
चुनाव आयोग और वोट चोरी के आरोप
कार्यक्रम में चुनाव आयोग की निष्पक्षता और जवाबदेही को लेकर भी सवाल उठाए गए। राहुल गांधी द्वारा विभिन्न राज्यों में कथित वोट चोरी के आरोपों और चुनावी प्रक्रिया में अनियमितताओं को लेकर किए गए दावों का जिक्र किया गया।
वक्ताओं ने कहा कि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि मतदाताओं का संस्थानों पर भरोसा बना रहे। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठे सवालों के जवाब देने की जरूरत बताई। ये आरोप और टिप्पणियां थीं, स्थापित निष्कर्ष नहीं।
क्या 2029 के चुनावों पर पड़ेगा असर?
कार्यक्रम के अंत में 2029 के लोकसभा चुनावों को लेकर चर्चा हुई। नीरज झा ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक स्थिति पर सवाल उठ सकते हैं और जनता में सरकार की आलोचना करने की प्रवृत्ति बढ़ती दिखाई दे रही है।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि सड़कों पर दिखने वाले जनाक्रोश का चुनावी नतीजों में कितना असर पड़ेगा, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता का भरोसा, चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और स्वतंत्र पत्रकारिता महत्वपूर्ण हैं।
कार्यक्रम का मुख्य संदेश यह रहा कि लोकतांत्रिक विरोध, पुलिस की जवाबदेही और चुनावी संस्थाओं पर भरोसे को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच के जरिए दिया जाना चाहिए।
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