जामिया में छात्र संघ बहाली की मांग और पुलिस तैनाती
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की प्रतिष्ठित सेंट्रल यूनिवर्सिटी, जामिया मिलिया इस्लामिया इन दिनों एक बड़े विवाद और विरोध प्रदर्शन का केंद्र बनी हुई है। छात्र पिछले कई दिनों से विश्वविद्यालय में छात्र संघ (Student Union) को बहाल करने की मांग को लेकर लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। छात्रों का आरोप है कि प्रशासन उनकी इस लोकतांत्रिक मांग को दबाने की कोशिश कर रहा है। स्थिति यह हो गई है कि यूनिवर्सिटी कैंपस को भारी पुलिस बल और पैरामिलिट्री फोर्स की तैनाती के जरिए किसी छावनी में तब्दील कर दिया गया है। मुख्य द्वारों पर लोहे की जाली लगाकर छात्रों और बाहर के लोगों का आना-जाना प्रतिबंधित कर दिया गया है।
छात्रों के गंभीर आरोप: बुनियादी सुविधाएं और भोजन पर रोक
प्रदर्शन कर रहे बीटेक और अन्य विभागों के छात्रों ने प्रशासन और पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। छात्रों का कहना है कि उन्हें जेल जैसी स्थिति में रखा जा रहा है। हड़ताल पर बैठे छात्रों के लिए बाहर से आने वाले खाने और पानी की आपूर्ति तक को रोक दिया गया है। इसके अलावा, कैंपस के भीतर वॉशरूम और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं को भी बाधित किया जा रहा है। छात्रों का कहना है कि वे कोई बड़ा अपराध नहीं कर रहे, बल्कि केवल अपना लोकतांत्रिक हक मांग रहे हैं ताकि प्रशासन को जवाबदेह बनाया जा सके, लेकिन इसके बदले उन्हें पुलिसिया सख्ती और धमकियों का सामना करना पड़ रहा है।
धारा 163 और नेताओं के समर्थन पर कानूनी शिकंजा
यूनिवर्सिटी के बाहर और आसपास सुरक्षा के कड़े इंतजाम के तहत धारा 163 लागू कर दी गई है, जिसके जरिए लाउडस्पीकर से लगातार कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी जा रही है। छात्रों के समर्थन में पहुंचने वाले कुछ विपक्षी नेताओं जैसे इमरान प्रतापगढ़ी और इमरान मसूद पर भी पुलिस द्वारा कार्रवाई और एफआईआर दर्ज करने की खबरें सामने आई हैं। छात्रों का आरोप है कि अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों जैसे डीयू या जेएनयू में छात्र राजनीति और चुनाव सहजता से स्वीकार किए जाते हैं, लेकिन जामिया जैसी अल्पसंख्यक यूनिवर्सिटी में इस तरह की पाबंदियां एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हैं।
निष्कर्ष: शिक्षा के मंदिरों में लोकतांत्रिक अधिकारों की सुगबुगाहट
यह पूरा प्रकरण देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों के अधिकारों, सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है। एक तरफ जहां देश के कई बड़े नेता छात्र राजनीति की सीढ़ी चढ़कर शीर्ष पदों तक पहुंचे हैं, वहीं जामिया के छात्रों को अपने लोकतांत्रिक अधिकारों और छात्र संघ की बहाली के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यदि शिक्षण संस्थानों में संवाद के दरवाजे बंद करके इस तरह की सख्ती बरती जाएगी, तो यह देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और शिक्षा प्रणाली दोनों के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है।





