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H-1B वीजा की फ़ीस बढ़ी। क्या मोदी-ट्रम्प की दोस्ती भुगत रहा है भारत?

अमेरिका के H-1B वीज़ा शुल्क और टैरिफ़ बढ़ोतरी के पीछे भारत का रूस से तेल खरीदना बड़ा कारण है। मुनाफ़ा अंबानी-अदानी को, सज़ा बेरोज़गारी और महंगाई के रूप |

H-1B वीजा की फ़ीस बढ़ी। क्या मोदी-ट्रम्प की दोस्ती भुगत रहा है भारत?
फोटो: narendra modi, H-1B visa

अमेरिका ने H-1B वीजा की फीस बढ़ाकर $1,00,000 की। 

19 सितंबर 2025 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नया आदेश पास किया, जिसके तहत H-1B वीज़ा आवेदक को अब अमेरिकी सरकार को 1 लाख डॉलर यानी करीब 88 लाख रुपये की फीस चुकानी होगी। शुरुआती खबरों में इसे सभी H-1B वीज़ा होल्डर्स पर लागू बताया गया, लेकिन व्हाइट हाउस ने साफ़ किया कि ये सिर्फ नए वीज़ा के लिए एकमुश्त शुल्क है। यानी रिन्यू या मौजूदा वीज़ा होल्डर्स पर कोई असर नहीं। लेकिन क्या इससे भारतीयों को राहत मिली? बिल्कुल नहीं। पहले H-1B वीज़ा की फीस कुल मिलाकर करीब 1,500 डॉलर यानी 1.32 लाख रुपये थी। अब यह बढ़कर 65 गुना हो गई है। ये वीज़ा 1990 में STEM यानी साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, मैथेमेटिक्स के स्किल्ड कर्मचारियों के लिए शुरू हुआ था, जिनके अमेरिका में विकल्प नहीं मिल रहे थे। लेकिन ट्रंप की सख़्त अप्रवासन नीति और भारी फीस के कारण इस वीज़ा के लिए आवेदन करना लगभग असंभव हो गया। यूएस सिटिज़नशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज़ के आंकड़ों के मुताबिक़ अगले वित्त वर्ष में H-1B वीज़ा की संख्या घटकर सिर्फ़ 3,59,000 रह गई है, जो पिछले चार सालों में सबसे कम है। H-1B वीज़ा पाने वालों में सबसे ज़्यादा भारतीय हैं 71% बावजूद इसके, भारतीय विदेश मंत्रालय ने अमेरिका के इस फैसले पर केवल “अध्ययन किया जा रहा है” जैसा बयान दिया। किस चीज का अध्ययन किया जा रहा है? 

अमेरिका भारत पर लगातार प्रतिबंध क्यों लगा रहा है?


अमेरिका भारत पर जितने भी टैक्स और टैरिफ लगा रहा है, उसके पीछे एक बड़ा कारण है भारत का रशिया से तेल खरीदना। रशिया-यूक्रेन युद्ध के बाद रशिया दुनिया भर को सस्ता तेल बेचने लगा। भारत सरकार ने इसे बड़े “डिप्लोमैटिक मास्टरस्ट्रोक” की तरह पेश किया “देखिए, हम रशिया से सस्ता तेल खरीद रहे हैं,” लेकिन जरा सोचिए, फायदा किसे मिला? आम आदमी को? नहीं। इस खेल के सबसे बड़े खिलाड़ी बने अदानी और अंबानी। ये लोग रशिया से डिस्काउंट पर तेल खरीदते हैं, फिर उसे रिफाइन कर इंटरनेशनल मार्केट में महंगे दामों पर बेचते हैं। इनकी कमाई अरबों-खरबों की, लेकिन जनता के हिस्से में सिर्फ़ महंगाई। जिस हिसाब से रशिया से तेल ख़रीदा गया, भारत में पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें आधी हो जानी चाहिए थीं। लेकिन हुआ क्या? 100 रुपये से ऊपर वाला पेट्रोल वहीं का वहीं रहा और न ही डीज़ल सस्ता हुआ। यानी रशिया से सस्ता तेल लेने का फायदा 1 फ़ीसदी भी आम लोगों तक नहीं पहुँचा। सरकार टीवी पर ताली बजाती रही, “भारत ने रशिया से रिकॉर्ड तेल खरीदा”, और मीडिया ने इसे मोदी सरकार की “विजयगाथा” बना दिया गया। 

अमेरिका ने रशिया पर सैंक्शंस लगा रखें थे। रशिया के साथ व्यापार जोखिम भरा हो सकता था ये बात अड़ानी-अंबानी भी जानते थे और सरकार भी। लेकिन फिर भी इन्होंने रशिया से तेल ख़रीदा। जिसके बाद अमेरिका ने भारत पर टैरिफ़ बढ़ा कर 50% कर दिया। यानी तेल ख़रीदने की सज़ा दी गई। और सज़ा किसे मिली? न अंबानी को, न अदानी को, न सरकार में बैठे ताकतवर लोगों को। इसका बोझ सीधा आम जनता के सिर पर आया। अमेरिका में भारत के सामान की माँग कम हो गई, जिसके कारण भारत हज़ारों की संख्या में लोग बेरोजगार हो गए। यानी जो तेल का डिस्काउंट देश के करोड़पति कारोबारी खा गए, उसका जुर्माना भरने की जिम्मेदारी देश के गरीब और मध्यम वर्ग पर आ गई। सोचिए, क्या जनता ने रशिया से तेल खरीदा था? नहीं। जनता ने कोई डील साइन की थी? नहीं। जनता ने कोई मुनाफा कमाया था? बिल्कुल नहीं। लेकिन जनता को ही बेरोज़गारी के रूप में हर्जाना चुकाना पड़ रहा है। क्या ऐसा नहीं लगता कि बड़ी कंपनियों ही देश की पूरी विदेश नीति तैयार कर रही हैं। जब ये रशिया से तेल ख़रीदती हैं तो सरकार उसे “भारत की कूटनीतिक जीत” बताती है। लेकिन जब अमेरिका सज़ा देता है तो सरकार चुप्पी साध लेती है, और उसका पूरा बोझ जनता पर डाल देती है।

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