सामान्य नियम यह कहता है कि नुकसान पहुँचाने वाली या ठप पड़ी संपत्ति को ही बेचा जाता है। लेकिन जब सरकार लगातार मुनाफे में चल रही संस्थाओं, बैंकों और अत्याधुनिक तकनीकों में अपनी हिस्सेदारी घटाने या उन्हें निजी हाथों में सौंपने लगे, तो आर्थिक नीतियों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
IDBI और चार प्रमुख सरकारी बैंकों में हिस्सेदारी घटाने की तैयारी
'इकोनॉमिक टाइम्स' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, IDBI बैंक में 60.72% हिस्सेदारी बेचने के बाद अब सरकार चार और सरकारी बैंकों—सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, यूको बैंक, पंजाब एंड सिंध बैंक, और इंडियन ओवरसीज बैंक में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 75% पर लाने की योजना बना रही है।
सरकार इसके पीछे 'मिनिमम पब्लिक शेयरहोल्डिंग' (कम से कम 25% पब्लिक हिस्सेदारी) का तर्क दे रही है। हालाँकि, ध्यान देने योग्य बात यह है कि IDBI बैंक ने वित्त वर्ष 2026 में ₹9,513 करोड़ का शुद्ध लाभ कमाया था। इसके बावजूद, शेयर बाजार के भाव से भी कम कीमत पर इसकी हिस्सेदारी बेची गई।
आईएमपीसीएल फार्मा और इसरो की PSLV तकनीक का निजीकरण
बैंकों के अलावा, आयुर्वेदिक एवं यूनानी दवाएँ बनाने वाली मुनाफा कमाने वाली सरकारी कंपनी IMPCL (इंडियन मेडिसिंस फार्मास्यूटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड) को 121 करोड़ रुपये में एक निजी कंपनी को सौंप दिया गया।
इससे भी बड़ा कदम स्पेस सेक्टर में देखने को मिला। इसरो (ISRO) का सबसे भरोसेमंद और कमाऊ रॉकेट PSLV (पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल), जिसने विदेशी उपग्रहों को लॉन्च करके करोड़ों डॉलर की विदेशी मुद्रा कमाई है, अब निजी कंपनियों द्वारा बनाया जाएगा। बोली प्रक्रिया में यह शर्त रखी गई कि कोई भी सरकारी कंपनी इसमें हिस्सा नहीं ले सकती।
रिकॉर्ड टैक्स कलेक्शन और बढ़ता राष्ट्रीय कर्ज: पैसा जा कहाँ रहा है?
एक तरफ सरकार का राजस्व लगातार बढ़ रहा है—वित्त वर्ष 2025-26 में ग्रॉस जीएसटी कलेक्शन रिकॉर्ड ₹22.27 लाख करोड़ तक पहुँच गया। वहीं, पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी से भी केंद्र सरकार को भारी आय हो रही है।
दूसरी ओर, देश पर कर्ज का बोझ भी तेज़ी से बढ़ा है। वर्ष 2014 में जो केंद्रीय कर्ज ₹55 लाख करोड़ था, वह बढ़कर ₹160 लाख करोड़ के पार पहुँच चुका है और जल्द ही ₹200 लाख करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है।
सवाल जो अनुत्तरित हैं
रिकॉर्ड टैक्स कलेक्शन, बढ़ता राष्ट्रीय कर्ज और मुनाफे वाली सरकारी संपत्तियों की बिक्री—ये तीनों स्थितियाँ एक साथ बनना आर्थिक विशेषज्ञों और आम जनता के मन में यह बड़ा सवाल खड़ा करती हैं कि आखिर देश का पैसा कहाँ इस्तेमाल हो रहा है?





