BSNL के पतन की कहानी में सत्ता के लोभ औऱ लालच की कथा समाहित है। मनमोहन की यूपीए-2 हो या मोदी की सरकार - BSNL सबकी आँखों में चुभता रहा। यही कारण है कि जो BSNL 2000-09 के दौर में हर साल मुनाफ़ा दर्ज़ कर रहा था, वह पिछले कुछ महीनों से कर्मचारियों को तनख़्वाह देने के लिए हाथ पसारे हुए है।
पिछले कुछ महीनों से BSNL की खबरें न केवल BSNL के कर्मचारियों बल्कि तमाम लोगों के लिए चिंता और चर्चा का विषय बनी हुईं हैं। किसी कार्यालय में कर्मचारियों को तनख़्वाह नहीं मिली तो किसी कार्यालय में कम तनख़्वाह मिली। त्यौहार बीतते रहे और BSNL के कर्मचारी की उम्मीदें जाती रही।
स्वैच्छिक रिटायरमेंट में स्वेच्छा कितनी
NDTV के जरिए BSNL के एक अधिकारी के हवाले से ख़बर आई है कि BSNL के 77000 कर्मचारी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना के तहत रिटायर हो रहे हैं। इस स्वैच्छिक योजना में स्वेच्छा कितनी है - ये समझना कोई मुश्किल काम नहीं है। जब देश 5G की तरफ नज़रें गड़ा रहा है, BSNL 4G लाइसेंस की बाट में है। कंपनी को प्राइवेटाइज़ किए जाने की कवायद चल रही है। जियो के अलावा कोई भी कंपनी बाज़ार में टिकने की हालत में नहीं है। ऐसे में BSNL के कर्मचारियों के सामने निकाले जाने, कंपनी बंद होने जैसी कई आशंकाएँ पैदा हो गई होंगी। मुमकिन है कि वर्तमान को देखकर और भविष्य को सोचकर कंपनी भी अधिक से अधिक कर्मचारियों को बिना हो-हल्ला बाहर कर देना चाहती हो। मतलब, इस स्वैच्छिक योजना में स्वेच्छा नहीं बल्कि ख़ौफ़ और चिंता बड़ी भूमिका निभा रही है।
आवंटन के साथ शुरू हुई पतन की कहानी
ख़ैर, बुरे दिनों ने BSNL को एकदम से धप्पा नहीं किया है। इसकी शुरुआत 2007-08 में BSNL को हुए स्पेक्ट्रम आवंटन से हुआ। BSNL को 2.5GHz-2.6GHz फ्रीक्वेंसी पर BWA (Broadband Wireless Access) मिला। दो सालों बाद 2010 में सरकार ने 4G नेटवर्क के लिए नीलामी शुरू की। ये नीलामी 2.3GHz-2.5GHz फ्रीक्वेंसी के लिए की गई। इस नीलामी में BSNL ने हिस्सा नहीं लिया क्योंकि उसे दो साल पहले ही स्पेक्ट्रम आवंटित कर दिया गया था।
तकनीक में पिछड़ती रही BSNL
इस नए आवंटन के बाद एयरटेल ने 2012 में LTE Network पर 4G सेवाएँ शुरू की। Department of Telecommunications के मुताबिक 2.6GHz फ्रीक्वेंसी बैंड में 4G सेवाएँ प्रदान करने के लिए तकनीक विकसित नहीं हो पाई है। नतीज़ा- BSNL ने सरकार से गुहार लगाना शुरू कर दिया कि 2600 MHz फ्रीक्वेंसी पर LTE Network के ज़रिए काम नहीं हो पाएगा। और इस आधार पर उसने सरकार से स्पेक्ट्रम के लिए चुकाए गए पैसों का रिफंड मांगने लगी।
सरकारों ने नहीं दिया साथ
सरकार देर करती रही और बाज़ार में BSNL की पकड़ ढ़ीली पड़ती रही। साल-दर-साल घाटा और कर्ज़ बढ़ता रहा। BSNL को कंपनी के संचालन में दिक्कत आने लगी। ये देखते हुए सरकार ने 2014 में BSNL को रिफंड दिया। ये रिफंड ऑपरेशनल खर्चों को चलाने के लिए और पहले से मौजूद 2G और 3G को मजबूत करने के लिए दिया गया। लेकिन अब तक टेलीकॉम सेक्टर की तस्वीर बदल चुकी थी। इस क्षेत्र में अवतरित हो गया था रिलायंस जियो।
जियो की उत्पत्ति के बाद से हर टेलीकॉम कंपनी घाटे में है। वोडाफोन और आइडिया साथ आने को मजबूर हो गए। कई टेलीकॉम कंपनियाँ बंद हो गईँ। जो बचीं वो भीषण घाटे को झेल रही हैं। ऐसे में सरकार की मुख़ालिफ़ योजनाओं को झेलते हुए तकनीक की दौड़ में पिछड़ चुकी BSNL के लिए मुनाफ़ा कमाना लगभग असंभव था। हुआ भी ऐसा ही। और बाद में सरकार BSNL की 4G Allocation की मांग को इसी आधार पर ठुकराती रही।
बहरहाल, कुछ सर्कल्स में BSNL की 4G सेवाएँ शुरू हो चुकी हैं। इस वर्ष के अंत तक कुछ और सर्कल्स में इसका विस्तार हो जाएगा। लेकिन अब उपभोक्ता की नज़रें 5G पर टिकी हैं। ऐसे में संभावना यही ज्यादा है कि BSNL के लिए 4G सेवाएं भी संजीवनी नहीं बन पाएँगी। कंपनी घाटे से नहीं उबर पाएगी और BSNL को बंद या प्राइवेटाइज़ कर देने की सरकार की अदृश्य मंशा शायद और मजबूत हो पाएगी।

