महाराष्ट्र के बीवाईएल नायर अस्पताल के सामने एक आंदोलन चल रहा है। आंदोलन पायल तदवी को इंसाफ दिलवाने का। पायल एक मेडिकल कॉलेज में ट्राइबल कम्यूनिटी से आने वाली 2nd year रेज़ींडेंट डॉक्टर थी। 22 तारीख को उन्होंने आत्महत्या कर ली। वजह - तीन सीनियर्स के द्वारा प्रताड़ना। लेकिन क्या केवल वो तीन सीनियर्स पायल तदवी की मौत की जिम्मेदार हैं? नहीं। पायल की मौत के पीछ एक पूरी व्यवस्था और सोच काम कर रही है।
Video : Payal Tadvi Suicide - क्या केवल तीन सीनियर डॉक्टर हैं जिम्मेदार? मनुवाद की आग में झुलसी पायल तदवी
वह सोच, जिसको भाँपते हुए बाबासाहेब ने संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की थी। वह सोच, जिसके प्रभाव में एक इंसान जातीय आधारों पर खुद को दूसरे से श्रेष्ठ समझता है। वह सोच, जो कभी किसी दलित की बारात रोक देती है तो कभी उनसे जबरन शौचालय साफ करवाती है।
तीन महिला डॉक्टर्स जिनपर प्रताड़ना के आरोपों की पुष्टि कॉलेज प्रशासन ने की है, वो भी महिला होने के नाते संविधान प्रदत्त सुविधाओं का प्रयोग कर रही होंगी। लेकिन उनकी सवर्ण जातीय पहचान उनके इंसान होने की बुनियादी समझ या महिला होने के गौरव से उपर थी। कारण - इस पितृसत्तात्मक समाज में अपने महिला होने के अस्तित्व के बदौलत वो आसानी से पुरुषों से आगे नहीं आ पाती। जबकि एक सवर्ण हिंदु होने के नाते सामाजिक संरचना के आधार पर उनके लिए उपर आना आसान था।
भारत में जातीय रूप से निचले तबके से आने के कारण लोगों को क्या क्या झेलना पड़ता है- किसी से छुपा नहीं है। राबड़ी देवी से लेकर मायावती तक जैसी बड़ी नेत्रियों को जातिगत निम्मनता का बोध कराने की कोशिश बार बार होती है। जीतन राम मांझी के बारे में क्या कुछ कहा गया - ये हम सब जानते हैं।
542 सांसदों के लिए हुए चुनाव में 86 दलित सांसद जबकि देश में दलितों के लिए आरक्षित कुल सीट 84 हैं। मतलब आरक्षित क्षेत्रों के अलावा 458 सीट पर केवल दो दलित सांसद। जिन लोगों को लगता है कि आरक्षण प्रतिभा का हत्यारा है उन्हें ये समझना चाहिए कि आरक्षण ने उन समूहों को ज़िदगी देने की कोशिश की है जो जातीय आधारों पर हर वक्त क़त्ल की जाती हैं।

