राजधानी दिल्ली में 2012 में हुए निर्भया गैंगरेप के बाद सरकार ने कानूनी प्रक्रिया में बड़े बदलाव किए थे। लेकिन कई लोगों का ऐसा मानना है कि इन बदलावों के बावजूद जमीन पर स्थिति बहुत कम ही बदल पाई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, निर्भया गैंगरेप के समय भारत में साल भर में बलात्कार के करीब 25,000 मामले रिपोर्ट किए जा रहे थे। लेकिन आज यह आंकड़ा 30,000 से अधिक पहुँच गया है। हालांकि, 2020 में कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन की वजह से इस आंकड़े में गिरवाट आई थी। लेकिन वर्तमान में स्थिति पहले से भी ख़राब हो गई है।
परेशानी की बात तो यह है 2016 में तो महिलाओं के साथ बलात्कार का सालाना आंकड़ा 39,000 तक पहुंच गया था। सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में देश भर में हर 15 मिनट में एक बलात्कार रिपोर्ट किया जा रहा था। एनसीआरबी ने महिलाओं से जुड़े अपराधों की रिपोर्ट आखिरी बार साल 2022 में जारी की थी। तब 31,000 से अधिक मामले सामने आए थे। जानकार मानते है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध के सामाजिक कारणों पर ध्यान देना जरूरी है।
क्या कहता है सरकार का कानून
सरकार महिला सुरक्षा से जुड़े कानूनों को बनाती रहती है, इसके बाबजूद महिलाओं के खिलाफ आपराधिक आंकड़े काम नहीं हो रहे। बलत्कार के लिए न्यूनतम सजा 10 साल है और अधिकतम आजीवन कारावास। वहीं, पीड़िता अगर 12 साल से कम उम्र की होती है, तो मौत की सजा का भी प्रवधान है।
कई बलात्कार पीड़ितों के लिए केस लड़ चुकीं वरिष्ठ वकील रेबेका एम जॉन कहती हैं कि अभी भी बलात्कारियों को लगता है कि वो अपराध करके बच सकते हैं, क्योंकि एक कारण कानून के डर की कमी भी है। कानून को समान रूप से लागू नहीं किया जा रहा है। दूसरा कारण, पुलिस का काम भी इन मामले में बहुत खराब है। कई लोग तो यह मानते है है कि यह कानून सिर्फ कागज तक ही सीमित हैं। इनका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है।
एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक 2018 से 2022 के बीच बलात्कार के मामलों में दोष साबित होने की दर 27 से 28 प्रतिशत थी। इस अवधि में काफी समय तक पांच गंभीर अपराधों में से दूसरी सबसे नीची दर थी। इन पांच अपराधों में हत्या, अपहरण, दंगा करना और गंभीर चोट पहुंचना शामिल है।





