सरकार का पक्ष: ‘जानकारी मांगने का उद्देश्य अलग’
मुख्य न्यायाधीश जी. नरेन्द्र और न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की पीठ के समक्ष केंद्र और राज्य सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार जल्द ही इस मामले पर एक हलफनामा दाखिल करेगी, जिसमें इन विवरणों की आवश्यकता को स्पष्ट किया जाएगा।
मेहता ने अदालत में मौखिक रूप से कहा—
"मैं इस पर गौर करूंगा और इसकी प्रासंगिकता दिखाते हुए एक हलफनामा दाखिल करूंगा। इसका उद्देश्य कुछ और है। सरकार किसी की निजी जानकारी को रिकॉर्ड नहीं करना चाहती। मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि माननीय न्यायालय संतुष्ट हो।"
उन्होंने याचिकाकर्ता के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन को भी आश्वस्त किया कि "उन्हें जानकारी के गलत इस्तेमाल को लेकर चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मामला अदालत के समक्ष है।"
27 फरवरी की समय सीमा पर उठे सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने अदालत को बताया कि उत्तराखंड में लिव-इन जोड़ों के लिए 27 फरवरी एक महत्वपूर्ण तिथि है, क्योंकि यह उनके अनिवार्य पंजीकरण की अंतिम तिथि है। चूंकि UCC को 27 जनवरी को लागू किया गया था, इसलिए पंजीकरण के लिए जोड़ों को केवल एक महीने का समय दिया गया।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि—
"आधार से जुड़े बायोमेट्रिक डेटा और पिछले संबंधों की जानकारी एकत्र करने की प्रासंगिकता क्या है?" इससे पहले, उच्च न्यायालय ने इस याचिका पर केंद्र और उत्तराखंड सरकार से जवाब तलब किया था। इसके साथ ही ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की सदस्य रजिया बेग द्वारा दायर एक अन्य याचिका पर भी नोटिस जारी किया गया है।
रजिया बेग ने UCC को शरिया कानून के खिलाफ बताते हुए अदालत में चुनौती दी है। उच्च न्यायालय ने इस मामले में अगली सुनवाई 1 अप्रैल, 2025 को निर्धारित की है, जहां सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।लिव-इन पार्टनर्स का डेटा क्यों जरूरी? उत्तराखंड सरकार हाईकोर्ट में देगी जवाब |





