ट्रम्प का चुनावी धांधली पर पुराना रुख
यह कार्यकारी आदेश ट्रम्प की उस पुरानी रणनीति के अनुरूप है, जिसके तहत उन्होंने बार-बार चुनावी प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए हैं। 2020 के राष्ट्रपति चुनावों में हार के बाद से ही उन्होंने दावा किया था कि बड़े पैमाने पर चुनावी धांधली हुई थी, हालांकि इस दावे का कोई ठोस सबूत नहीं मिला।
ट्रम्प विशेष रूप से मेल-इन वोटिंग (डाक द्वारा मतदान) के खिलाफ मुखर रहे हैं। उनका तर्क है कि यह प्रणाली असुरक्षित है और धांधली को बढ़ावा देती है, हालांकि उनकी यह धारणा वैज्ञानिक तथ्यों और आंकड़ों से मेल नहीं खाती। शोध बताते हैं कि अमेरिका में चुनावी धोखाधड़ी के मामले अत्यंत दुर्लभ होते हैं और उन पर कानूनी कार्रवाई भी की जाती है।
SAVE एक्ट की अनदेखी?
इस कार्यकारी आदेश में नागरिकता के दस्तावेजी प्रमाण की आवश्यकता से यह संकेत मिलता है कि ट्रम्प कांग्रेस में रिपब्लिकनों द्वारा प्रस्तावित "सेफगार्ड अमेरिकन वोटर एलिजिबिलिटी एक्ट" (SAVE एक्ट) को पारित होने का इंतजार नहीं कर रहे। इस प्रस्ताव का उद्देश्य भी मतदान के लिए नागरिकता प्रमाण अनिवार्य बनाना है।
रिपब्लिकन पार्टी इस आदेश का समर्थन करते हुए इसे चुनावों में जनता का विश्वास बहाल करने के लिए जरूरी मान रही है। वर्तमान अमेरिकी कानून के तहत, संघीय चुनावों में गैर-नागरिकों द्वारा मतदान पहले से ही अवैध है और इसके परिणामस्वरूप गंभीर कानूनी कार्रवाई हो सकती है, जिसमें निर्वासन (डिपोर्टेशन) भी शामिल है।
ट्रम्प के आदेश के अनुसार, संघीय एजेंसियों—होमलैंड सिक्योरिटी विभाग, सामाजिक सुरक्षा प्रशासन और विदेश विभाग—को निर्देश दिया गया है कि वे चुनाव अधिकारियों के साथ संघीय डेटा साझा करें, जिससे मतदाता सूची में गैर-नागरिकों की पहचान हो सके।
इसके अलावा, अटॉर्नी जनरल को निर्देश दिया गया है कि वे उन राज्यों पर विशेष ध्यान दें जो चुनाव संबंधी संदेहास्पद गतिविधियों की जानकारी संघीय सरकार के साथ साझा नहीं करते हैं। मंगलवार (25 मार्च, 2025) को डेमोक्रेट्स की ओर से कानूनी चुनौती की धमकी भी दी गई। डेमोक्रेटिक वकील मार्क एलियास, जो ट्रम्प के आलोचक रहे हैं, ने सोशल मीडिया पर कहा, "यह बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हम मुकदमा करेंगे।"
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