Molitics Logo
होम सरकार ने किया स्पष्ट— सेप्टिक टैंक की सफाई जाति-आधारित कार्य नहीं है, लेकिन 92% सफाईकर्मी दलित और OBC

सरकार ने किया स्पष्ट— सेप्टिक टैंक की सफाई जाति-आधारित कार्य नहीं है, लेकिन 92% सफाईकर्मी दलित और OBC

सरकार ने किया स्पष्ट— सेप्टिक टैंक की सफाई जाति-आधारित कार्य नहीं है, लेकिन 92% सफाईकर्मी दलित और OBC

सरकार ने किया स्पष्ट— सेप्टिक टैंक की सफाई जाति-आधारित कार्य नहीं है, लेकिन 92% सफाईकर्मी दलित और OBC
फोटो: सरकार ने किया स्पष्ट— सेप्टिक टैंक की सफाई जाति-आधारित कार्य नहीं है, लेकिन 92% सफाईकर्मी दलित और OBC
संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान केंद्र सरकार ने कहा कि सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई जाति-आधारित नहीं, बल्कि 'व्यवसाय-आधारित गतिविधि' है। द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्रालय ने मंगलवार (18 दिसंबर) को संसद में भारत के शहरों और कस्बों में सीवर और सेप्टिक टैंक श्रमिकों (एसएसडब्ल्यू) का पहला सर्वेक्षण प्रस्तुत किया। 

केंद्रीय सामाजिक न्याय राज्य मंत्री रामदास अठावले ने कांग्रेस सांसद कुलदीप इंदौरा के प्रश्न के उत्तर में बताया कि सरकार के नमस्ते कार्यक्रम (NAMASTE programme) के अंतर्गत 33 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 54,574 एसएसडब्ल्यू की पहचान और सत्यापन किया गया। इनमें 67.91% (37,060) सफाईकर्मी अनुसूचित जाति से, 15.73% (8,587) ओबीसी समुदायों से, 8.31% (4,536) अनुसूचित जनजाति से, और 8.05% (4,391) सामान्य श्रेणी से हैं। अठावले ने संसद में कहा, 'सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई जाति-आधारित नहीं, बल्कि व्यवसाय-आधारित गतिविधि है।' हालांकि, आंकड़े दर्शाते हैं कि देश भर में करीब 92% एसएसडब्ल्यू एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों से हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2019 से 2023 के बीच देश भर में सीवर और सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई के दौरान कम से कम 377 लोगों की मृत्यु हुई। केंद्र सरकार का मानना है कि हाथ से मैला ढोने की प्रथा के उन्मूलन से सीवर और सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई का मुद्दा हल हो गया है। यह तर्क मैनुअल स्कैवेंजिंग और खतरनाक सफाई के बीच के तकनीकी अंतर पर आधारित है, जैसा कि मैनुअल स्कैवेंजर्स के रोजगार निषेध और पुनर्वास अधिनियम में परिभाषित है।

महत्वपूर्ण है कि 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से प्राप्त राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग (एनसीएसके) के आंकड़ों के अनुसार, 1993 के बाद से सीवर और सेप्टिक टैंक में हुई मौतों के 1,248 मामलों में से मार्च 2023 तक 1,116 मामलों में मुआवजा दिया जा चुका है। 81 मामलों में भुगतान लंबित है, जबकि 51 मामले बंद कर दिए गए हैं। 1993 के बाद से सीवर और सेप्टिक टैंक में सबसे अधिक मौतें तमिलनाडु में हुईं (256 मामले)। इसके बाद गुजरात (204), उत्तर प्रदेश (131), हरियाणा (115) और दिल्ली (112) का स्थान है। सबसे कम मामले छत्तीसगढ़ (1), त्रिपुरा और ओडिशा (2-2), दादर और नगर हवेली (3), तथा झारखंड (4) में दर्ज हुए। अप्रैल 2023 से मार्च 2024 तक के 58 मामलों में सर्वाधिक घटनाएं तमिलनाडु (11) में हुईं, उसके बाद महाराष्ट्र और राजस्थान (11-11), गुजरात (8) और पंजाब (6) में हुईं। 

आंकड़े बताते हैं कि 1993 के बाद हुई 1,247 मौतों में से 456 मामले 2018 के बाद दर्ज किए गए। 2014 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, सीवर/सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान किसी कर्मचारी की मृत्यु पर पीड़ित परिवार को 10 लाख रुपये का मुआवजा निर्धारित था। अक्टूबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने यह राशि बढ़ाकर 30 लाख रुपये कर दी। पिछले वर्ष 94 मामलों में मुआवजा दिया गया। उल्लेखनीय है कि भारत में मैला ढोने की प्रथा प्रतिबंधित है। मैनुअल स्कैवेंजिंग एक्ट 2013 के तहत किसी भी व्यक्ति को सीवर में उतारना पूर्णतः निषिद्ध है। विशेष परिस्थितियों में यदि किसी सफाईकर्मी को सीवर में उतारा जाता है, तो 27 सुरक्षा नियमों का पालन अनिवार्य है। फिर भी, इन नियमों के निरंतर उल्लंघन के कारण सीवर सफाई के दौरान श्रमिकों की मृत्यु की घटनाएं जारी हैं।