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झारखंड की राजनीति के स्तंभ शिबू सोरेन नहीं रहे, 81 साल की उम्र में हुआ निधन

झारखंड की राजनीति के दिग्गज नेता और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक संरक्षक शिबू सोरेन का 81 वर्ष की आयु में निधन हो गया।

झारखंड की राजनीति के स्तंभ शिबू सोरेन नहीं रहे, 81 साल की उम्र में हुआ निधन
फोटो: झारखंड की राजनीति के स्तंभ शिबू सोरेन नहीं रहे, 81 साल की उम्र में हुआ निधन
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक संरक्षक शिबू सोरेन का सोमवार को 81 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने सोमवार को दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में अंतिम सांस ली। वे बीते कई हफ्तों से गंभीर रूप से बीमार थे और वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे। जून के अंतिम सप्ताह में उन्हें किडनी संबंधी जटिलताओं के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया था। तब से उनकी स्थिति लगातार नाजुक बनी हुई थी और डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा था, लेकिन स्वास्थ्य में कोई खास सुधार नहीं हो सका।

शिबू सोरेन के निधन पर हेमंत सोरेन ने शोक व्यक्त किया


शिबू सोरेन के निधन की पुष्टि करते हुए झारखंड के मुख्यमंत्री और उनके पुत्र हेमंत सोरेन ने गहरा दुख जताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “आदरणीय गुरुजी दिशोम हम सबको छोड़कर चले गए हैं।” सोरेन के निधन से राज्य की राजनीति में शोक की लहर दौड़ गई है। शिबू सोरेन झारखंड आंदोलन के प्रमुख चेहरों में से एक थे।झारखंड की राजनीति के प्रमुख स्तंभ शिबू सोरेन ने मात्र 18 वर्ष की आयु में संथाल नवयुवक संघ की स्थापना की थी, जो उनके सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत मानी जाती है। 

राजनीतिक करियर की शुरुआत में सोरेन को 1977 के लोकसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा, लेकिन 1980 में उन्होंने दुमका सीट से पहली बार लोकसभा में प्रवेश किया। इसके बाद वे 1989, 1991 और 1996 में भी लोकसभा के लिए चुने गए। 2002 में राज्यसभा के सदस्य बने, लेकिन उसी वर्ष दुमका लोकसभा उपचुनाव जीतने के बाद उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया। 2004 में एक बार फिर लोकसभा के लिए निर्वाचित होने के बाद, शिबू सोरेन को मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय कोयला मंत्री बनाया गया। 

हालांकि, चिरुडीह हिंसा कांड में उनके नाम पर जारी पुराने गिरफ्तारी वारंट के चलते उन्हें इस्तीफा देने के लिए बाध्य होना पड़ा। शिबू सोरेन न केवल झारखंड की राजनीति के एक मजबूत स्तंभ रहे, बल्कि आदिवासी अधिकारों की आवाज़ भी बने। उनके निधन से राज्य में शोक की लहर दौड़ गई है। वे चार दशकों से झामुमो की राजनीति का केंद्र रहे और ‘गुरुजी’ के नाम से व्यापक जनसमर्थन प्राप्त किया। उनके निधन को झारखंड की राजनीति में एक युग के अंत के रूप में देखा जा रहा है।