हालांकि, जब द इंडियन एक्सप्रेस ने इस मामले की पड़ताल की और शिरडी के जिला अधिकारियों से बात की, तो सच्चाई कुछ और ही निकली। अधिकारियों ने बताया कि वास्तव में यह संख्या 3000 के आसपास थी और इनमें लोनी कस्बे के एक शैक्षणिक संस्थान के हॉस्टल में रहने वाले छात्र भी शामिल थे। चूंकि यह संस्थान शिरडी विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है, इसलिए वहां रहने वाले छात्रों के वोटर रजिस्ट्रेशन में संस्थान का पता दर्ज किया गया।
शिरडी के जिला कलेक्टर सिद्धराम सलीमथ ने भी इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने बताया कि जब पहली बार इस मुद्दे को लेकर किसी राजनीतिक दल ने शिकायत दर्ज कराई, तो उन्होंने चुनाव आयोग को वास्तविक स्थिति से अवगत कराया। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोनी क्षेत्र में कई शैक्षणिक संस्थान हैं और नए पंजीकृत मतदाताओं में अधिकांश हॉस्टल में रहने वाले छात्र हैं। कलेक्टर के मुताबिक, 18 वर्ष से अधिक आयु का कोई भी व्यक्ति अपने आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर यह चुन सकता है कि वह किस स्थान से मतदान करेगा। चूंकि ये छात्र अपने हॉस्टल में रहते हैं, इसलिए उनके रेजिडेंस प्रूफ के रूप में उनके कॉलेज एडमिशन पेपर का उपयोग किया गया।
उन्होंने यह भी बताया कि मतदाता सूची प्रकाशित होने से पहले राजनीतिक दलों को अपनी आपत्तियां और सुझाव देने का अवसर दिया गया था। चुनाव आयोग ने यह भी जांच की थी कि क्या किसी मतदाता का नाम दो बार दर्ज किया गया है, लेकिन ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिरडी सीट से भाजपा के उम्मीदवार राधाकृष्ण विखे पाटिल ने कांग्रेस की प्रभावती घोगरे को हराकर जीत दर्ज की थी। पाटिल राज्य सरकार में सिंचाई मंत्री भी हैं। दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों के नतीजे घोषित होने के छह दिन बाद भी इस मुद्दे को उठाया था। पार्टी ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर मांग की थी कि लोकसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र में मतदाताओं की संख्या में 13% की वृद्धि कैसे हुई, इसकी जानकारी दी जाए। कांग्रेस ने आयोग से यह भी पूछा था कि मतदाता सूची में जोड़े गए 39 लाख नए मतदाताओं का विवरण सार्वजनिक किया जाए।
राहुल गांधी के इस बयान ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी थी। जहां एक ओर कांग्रेस इसे मतदाता सूची में गड़बड़ी का मामला बता रही थी, वहीं भाजपा इसे विपक्ष की हताशा करार दे रही थी। हालांकि, जिला अधिकारियों और चुनाव आयोग की जांच के बाद यह स्पष्ट हो गया कि मतदाताओं की संख्या में हुई वृद्धि किसी षड्यंत्र का हिस्सा नहीं थी, बल्कि इसमें छात्र-मतदाताओं की बड़ी संख्या शामिल थी।
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