यह फर्म 'जेएमआई लॉ एसोसिएट्स' के नाम से संचालित हो रही थी, जिसे जमाल मोहम्मद इब्राहीम नामक व्यक्ति चला रहे थे। हालांकि, वह पेशेवर वकील नहीं थे, फिर भी इस फर्म को चला रहे थे। इस फर्म के साथ दो अन्य लोग जुड़े थे, जिनमें एक वकील प्रीति भास्कर और दूसरा कमलेश चंद्रशेखरन था। कोर्ट ने बताया कि यह पूरी घटनाक्रम उच्च स्तर पर जांच के योग्य है, क्योंकि यह कानूनी क्षेत्र की ईमानदारी और पेशेवर मानकों का उल्लंघन कर रहा है।
लिंक्डइन पर इस फर्म द्वारा विज्ञापन देने और अपनी सेवाओं का प्रचार करने पर जस्टिस चंदीरा ने अपनी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि फर्म ने अदालतों द्वारा जारी किए गए नियमित आदेशों का हवाला देते हुए अपनी कानूनी सेवाओं का प्रचार किया और विज्ञापन चलाए।
इसके अलावा, आरोप है कि इस फर्म के संचालक पहले भूमि अतिक्रमणकारियों के खिलाफ मुकदमा करते थे, फिर भूमि मालिकों के पक्ष में अदालत में पेश होते थे और बाद में उन पर दबाव डालते थे कि वे अपनी भूमि छोड़ दें और इसके बदले भारी रकम की लेन-देन में शामिल होते थे।
हाई कोर्ट ने कानूनी पेशे को एक महान और सम्मानजनक पेशा बताया और स्पष्ट किया कि इसे व्यवसाय या व्यापार के रूप में नहीं देखा जा सकता। जस्टिस चंदीरा ने कहा कि वकील और कानूनी पेशेवरों से ईमानदारी और निष्पक्षता की उम्मीद की जाती है। उन्होंने कहा कि अगर कोई वकील न्यायालय की प्रक्रियाओं का दुरुपयोग करता है, तो यह पेशेवर कदाचार के रूप में माना जाएगा।
कोर्ट ने 'जेएमआई लॉ एसोसिएट्स' और उसके प्रतिनिधियों द्वारा कथित अवैध गतिविधियों की गहन जांच का आदेश दिया है। तमिलनाडु और पुडुचेरी बार काउंसिल को इस फर्म से जुड़े तीन अधिवक्ताओं - प्रीति भास्कर, मणि भारती और एबेल सेल्वाकुमार के कानून की डिग्री और उनके कॉलेज में नामांकन की वास्तविकता की जांच करने का आदेश दिया गया है।
इसके साथ ही, राज्य बार काउंसिल को यह भी निर्देश दिया गया है कि यह जांच की जाए कि क्या यह फर्म एक कानूनी रूप से स्थापित लॉ फर्म के रूप में कार्य करने का हकदार है। इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि इस फर्म द्वारा अदालतों और न्यायाधिकरणों में दायर किए गए वकालतनामों की भी पूरी तरह से जांच की जाए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनके द्वारा दायर किए गए मामले कानूनी रूप से उचित थे या नहीं।
यह मामला न केवल तमिलनाडु में बल्कि पूरे देश में कानूनी पेशे की गंभीरता और इसकी प्रतिष्ठा को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है। इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि अगर कोई व्यक्ति कानूनी पेशे में काम करना चाहता है, तो उसे न केवल उचित कानूनी शिक्षा प्राप्त करनी होगी, बल्कि उसे पूरी तरह से इस पेशे के मानकों और नैतिकता का पालन भी करना होगा।
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