इसके लिए लालू यादव को न केवल माफी मांगनी चाहिए बल्कि गंगा किनारे जाकर बालू-गोबर खाकर और गंगाजल से प्रायश्चित करना चाहिए। यदि उन्हें हिंदू धर्म में आस्था नहीं है, तो वे फुलवारीशरीफ जाकर वहां भी प्रायश्चित कर सकते हैं।"
यह विवाद लालू प्रसाद यादव के 78वें जन्मदिन समारोह के दौरान रिकॉर्ड किए गए एक कथित वीडियो के वायरल होने के बाद शुरू हुआ। वीडियो में लालू यादव एक सोफे पर बैठे नजर आते हैं और उनके पैर पास के सोफे पर टिके हुए हैं। इसी दौरान एक समर्थक डॉ. आंबेडकर की तस्वीर लेकर आता है और उसे उनके पैरों के पास रख देता है। इस घटना को लेकर राजनीतिक विरोधियों ने लालू यादव पर आक्रामक रुख अपनाया और इसे आंबेडकर व दलित समाज का अपमान बताया।
भाजपा ने इस घटना के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। भाजपा कार्यकर्ताओं ने पटना में लालू यादव का पुतला फूंका और उनसे माफी की मांग की। बिहार के उपमुख्यमंत्री और प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष ने भी इस मामले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और राजद प्रमुख से जवाबदेही की मांग की।
इस बीच, बिहार राज्य अनुसूचित जाति आयोग ने भी इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने लालू प्रसाद यादव को नोटिस जारी कर उनसे स्पष्टीकरण मांगा है। आयोग ने 15 दिनों के भीतर जवाब देने की समयसीमा तय की है। आयोग ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि इस समयसीमा में जवाब नहीं दिया गया तो अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
आयोग के उपाध्यक्ष देवेंद्र कुमार ने कहा, "डॉ. आंबेडकर का अपमान करने के मामले में स्पष्टीकरण मांगने के लिए लालू प्रसाद यादव को नोटिस जारी किया गया है। यदि वे जवाब नहीं देते हैं, तो उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।"
इस विवाद ने बिहार की राजनीति में हलचल मचा दी है। भाजपा और अन्य विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को लेकर लालू यादव और राजद पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। दूसरी ओर, राजद की ओर से इस मामले पर अभी तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।





