इसमें किसी भी प्रकार की कोई छेड़छाड़ नहीं हुई है। रिपोर्ट में सब कुछ नियमों के अनुसार है और विरोध की कोई आवाज दबाई नहीं गई है।" उन्होंने यह भी कहा कि असहमति नोट को सही तरीके से शामिल किया गया था और किसी भी जरूरी जानकारी को रिपोर्ट से नहीं हटाया गया।
ओवैसी ने अपने बयान में कहा, "मैंने वक्फ संशोधन विधेयक के खिलाफ संयुक्त समिति को एक विस्तृत असहमति नोट सौंपा था, लेकिन यह चौंकाने वाली बात है कि मेरी जानकारी के बिना कुछ हिस्सों को संपादित कर दिया गया। हटाए गए खंड विवादास्पद नहीं थे, बल्कि वे केवल तथ्यात्मक थे। रिपोर्ट में जो कुछ भी बदला गया है, वह केवल उनकी इच्छाओं के अनुसार किया गया।"
ओवैसी ने यह सवाल भी उठाया कि जब वे अपनी असहमति रिपोर्ट पूरी तरह से और सही तरीके से पेश कर रहे थे, तो उनके बिंदुओं को क्यों हटा दिया गया और विपक्ष की आवाज को दबाने का प्रयास क्यों किया गया?
ओवैसी के आरोपों के मुताबिक:
- 130 पन्नों से ज्यादा का असहमति नोट था, लेकिन रिपोर्ट में इसका कुछ हिस्सा शामिल नहीं किया गया।
- 8 से 10 पैराग्राफ को जानबूझकर ब्लैक आउट कर दिया गया।
- 40 असहमति बिंदुओं को पूरी तरह से हटा दिया गया।
- रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि वक्फ आदिवासियों की जमीन पर कब्जा कर रहा है, जिसे लेकर ओवैसी ने सख्त आपत्ति जताई और कहा कि यह पूरी तरह से गलत है।
ओवैसी के इन आरोपों के बाद राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस शुरू हो गई है, जहां उनका कहना है कि वक्फ सुधार विधेयक में जरूरी बदलावों और बिंदुओं को नजरअंदाज किया गया है, जो समाज के एक बड़े हिस्से के लिए महत्वपूर्ण थे। ओवैसी ने यह भी कहा कि अगर इस मुद्दे पर सरकार और समिति सही तरीके से जवाब नहीं देती है, तो वे आगे की कानूनी कार्रवाई करेंगे।
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