इसके साथ ही अदालत ने यह भी पूछा कि जिस वाहन में व्यक्ति को ले जाया गया था, उसके बारे में भी जानकारी दी जाए।
मामला इस प्रकार सामने आया कि याचिकाकर्ता को 18 फरवरी को दिल्ली के कनॉट प्लेस से यूपी पुलिस ने बिना किसी पूर्व सूचना के गिरफ्तार किया और उसे एक अज्ञात स्थान पर ले जाया। इसके बाद, 19 फरवरी को उत्तर प्रदेश की अदालत ने याचिकाकर्ता को रिहा करने का आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा कि याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी प्रथम दृष्टया अवैध प्रतीत होती है। बेंच ने 20 फरवरी को अपनी टिप्पणी में कहा, "यह मामला गंभीर है, क्योंकि ऐसा लगता है कि गिरफ्तारी के दौरान निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। गिरफ्तारी का कोई ठोस आधार भी नहीं बताया गया, जिससे यह गिरफ्तारी कानून के खिलाफ मानी जा सकती है।"
अदालत ने अपने फैसले में आगे कहा, " याचिकाकर्ता को रिहा कर दिया गया है, लेकिन यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि यूपी पुलिस द्वारा अंतरराज्यीय गिरफ्तारी के लिए निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया जाए। अदालत यह भी चाहती है कि सीसीटीवी फुटेज की जांच की जाए ताकि यह पता चल सके कि यूपी/नोएडा पुलिस ने दिल्ली पुलिस को सूचित किए बिना याचिकाकर्ता को कैसे गिरफ्तार किया। साथ ही, यह भी पता किया जाए कि क्यों निजी वाहनों का इस्तेमाल किया गया और यूपी पुलिस के अधिकारी वर्दी में नहीं थे।"
अदालत ने ग्रेटर नोएडा, यूपी के पुलिस कमिश्नर को आदेश दिया कि वे इस पूरे मामले की जांच कर अदालत को रिपोर्ट प्रस्तुत करें। इसके अतिरिक्त, उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से यह सवाल पूछा गया कि क्या अंतरराज्यीय गिरफ्तारी के मामलों में दिल्ली पुलिस के साथ कोई प्रोटोकॉल तय किया गया है, जैसा कि हाईकोर्ट के निर्देशों में अपेक्षित है।
यह मामला एक बार फिर यह दर्शाता है कि अंतरराज्यीय गिरफ्तारी के मामलों में उचित प्रक्रियाओं का पालन कितना महत्वपूर्ण है, और इस प्रकार के मामले में कानूनी दृष्टिकोण से किसी भी तरह की अनियमितता से बचना कितना आवश्यक है।
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