इधर, योगेंद्र यादव ने कहा कि हरियाणा में बीजेपी और कांग्रेस के बीच वोट शेयर एक फ़ीसदी से कम रहा है। मुख्य तौर पर हरियाणा में कांग्रेस नीति की बीजेपी ने काट ख़ोज ली, और अपने समीकरणों के चलते चुनाव जीत लिया। इसमें एक बड़ी भूल यह रही कि हरियाणा विधानसभा के चुनाव को आसान और एकतरफ़ा माना गया, जबकि बीजेपी ने कड़ी टक्कर देने के लिए अपनी विशेष रणनीति तैयार की थी। योगेंद्र यादव ने कहा कि वह मान रहे थे कि जो नैरेटिव बना है, उस से कांग्रेस को बढ़त मिलेगी। वह अब कमज़ोर नहीं होगी। ऐसा अनुमान इसलिए था क्योंकि किसान और पहलवान के मुद्दों को लेकर जो नैरेटिव तैयार हुआ था, उस पर पड़ने वाला वोट जेजेपी और इनेलो को मिलता नहीं दिख रहा था। इसके अलावा राहुल गांधी के आक्रामक अभियान से ऐसा लग रहा था कि दलित वोट बड़ी संख्या में कांग्रेस को ही मिलेगा।
बीजेपी और कांग्रेस का चुनावी दंगल
सत्यपाल मलिक ने कहा कि बीजेपी अपनी रणनीति के तहत 24 घंटे राजनीति करती है। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालातों को देखते हुए कांग्रेस को अभी और संघर्ष करने की जरूरत है। कांग्रेस अपनी ख़ामियों की वज़ह से हार का शिकार हुई। हरियाणा में मिली हार की सबसे बड़ी वज़ह पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा और सिरसा से लोकसभा सांसद कुमारी सैलजा के बीच आंतरिक खींचतान रही। सत्यपाल मलिक ने तीख़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि कांग्रेस चुनाव के दौरान आलस में रही, कांग्रेस को ज़मीनी स्तर पर जो मेहनत करनी चाहिए थी, वह पार्टी ने नहीं की। इसके अलावा अगर पार्टी में आपसी खींचतान नहीं होती, तो इसका फ़ायदा कांग्रेस को मिलता। कांग्रेस में केवल कुछ ही नेता है जो गंभीर रहते है, बाक़ी ज़्यादा एक्टिव नहीं रहते है। मलिक ने बीजेपी को भी नसीहत देते हुए कहा कि उन्हें घमंड में आने की बजाय प्रदेश के युवाओं और किसानों के लिए ख़ासतौर से काम करना चाहिए।
मलिक ने कहा कि अब बीजेपी को सरकार बनने के तुरंत बाद एमएसपी लागू कर देना चाहिए। वहीं, योगेंद्र यादव ने कहा कि ऐसा लगता है कि किसान, पहलवान, संविधान और जवान के नारे ने हरियाणा में कांग्रेस के लिए काम नहीं किया। चुनाव परिणाम को लेकर कांग्रेस अति-आत्मविश्वास में आ गई है। यह सच है कि बीजेपी सरकार के ख़िलाफ़ प्रदेश में माहौल था। ऐसा लग रहा था कि भाजपा की स्थिति 2014 और 2019 के मुकाबले कमज़ोर रहने वाली है। यादव ने कहा कि यह चुनाव दो तरफा था और कांग्रेस-भाजपा को मिलाकर कुल 79 फीसदी वोट पड़ा, जो 2014 में 55 फ़ीसदी ही था। उन्होंने कहा कि कांग्रेस शायद जाट समुदाय पर ज्यादा निर्भर हो गई, जबकि भाजपा अपनी रणनीति पर अमल करती रही। ओबीसी वर्ग से मुख्यमंत्री चुनना भी बीजेपी की सफ़ल रणनीतियों का हिस्सा रहा। आरक्षण में कोटा विवाद से बीजेपी को फ़ायदा मिला है, क्योंकि उसने इसपर अपनी स्थिति को साफ़ करते हुए, इसे सिरे से ख़ारिज़ कर दिया था।





