कौन हैं जस्टिस बी.आर. गवई?
मूल रूप से महाराष्ट्र के अमरावती निवासी जस्टिस गवई ने 16 मार्च, 1985 को वकालत की दुनिया में कदम रखा। उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट के पूर्व एडवोकेट जनरल और बाद में जज रहे राजा एस. भोंसले के अधीन प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच में संवैधानिक और प्रशासनिक मामलों में सक्रिय प्रैक्टिस की। इस दौरान वे नागपुर नगर निगम, अमरावती नगर निगम और अमरावती विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों के अधिवक्ता भी रहे।
अगस्त 1992 से जुलाई 1993 तक वे नागपुर बेंच में सहायक सरकारी वकील और अतिरिक्त लोक अभियोजक रहे। 17 जनवरी 2000 को उन्हें सरकारी वकील और लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त किया गया।
इसके बाद, 14 नवंबर 2003 को उन्हें बॉम्बे हाई कोर्ट में अतिरिक्त न्यायाधीश बनाया गया और 12 नवंबर 2005 को वे स्थायी न्यायाधीश बने। हाई कोर्ट में वे मुंबई, नागपुर, औरंगाबाद और पणजी की बेंचों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं।
24 मई 2019 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किया गया।
ऐतिहासिक फैसलों का हिस्सा रहे हैं
सुप्रीम कोर्ट में अपने कार्यकाल के दौरान जस्टिस गवई कई ऐतिहासिक और संवेदनशील मामलों की सुनवाई में शामिल रहे हैं:
- नोटबंदी: जनवरी 2023 में उन्होंने उस बहुमत वाले फैसले का समर्थन किया जिसमें केंद्र सरकार द्वारा 500 और 1000 रुपये के नोटों को अमान्य घोषित करने के निर्णय को वैध ठहराया गया।
- अनुच्छेद 370: दिसंबर 2023 में उन्होंने उस संविधान पीठ का हिस्सा बनकर केंद्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा हटाने के निर्णय को बरकरार रखा।
- इलेक्टोरल बॉन्ड: हाल ही में राजनीतिक चंदा देने की इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक करार देने वाली पीठ में भी वे शामिल रहे।
- SC-ST में क्रीमी लेयर: उन्होंने अनुसूचित जातियों और जनजातियों के भीतर "क्रीमी लेयर" की अवधारणा को मान्यता दी और कहा कि सच्ची समानता सुनिश्चित करने के लिए उप-वर्गीकरण जरूरी है।
- बुलडोजर कार्रवाई पर टिप्पणी: नवंबर 2024 में उनकी अध्यक्षता वाली दो-जजों की पीठ ने बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के संपत्तियों को ध्वस्त करने की प्रवृत्ति की आलोचना की और इसे कानून के खिलाफ बताया।
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