सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने यह भी स्पष्ट किया कि सैयद सलार मसूद गाजी की याद में अब तक सैकड़ों वर्षों से भारत के विभिन्न हिस्सों में मेला लगाया जाता है, जिसमें हर धर्म के लोग—हिंदू, मुस्लिम, सिख, और ईसाई—समान रूप से भाग लेते हैं। यह मेला न केवल सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता और भाईचारे की भावना को भी बढ़ावा देता है। लेकिन कुछ अधिकारी इस ऐतिहासिक परंपरा को बंद करने की कोशिश कर रहे हैं, जोकि उनकी नजर में संविधान के सिद्धांतों के खिलाफ है। सांसद ने यह मांग की कि इस विवाद को बढ़ावा देने और सूफी संत पर अमर्यादित टिप्पणी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
सांसद ने यह भी कहा कि यह बयान केवल नफरत की राजनीति को बढ़ावा देने के लिए दिया गया है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि ऐसे अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए। सोमनाथ मंदिर पर हमले से सैयद सलार मसूद गाजी को जोड़ना ऐतिहासिक रूप से गलत है, यह स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया कि जब सोमनाथ मंदिर पर हमला हुआ था, तब मसूद गाजी केवल 11 साल के थे और इस हमले में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। इसके बावजूद, कुछ अधिकारी बिना इतिहास को सही से जाने इस मुद्दे पर गलत बयानबाजी कर रहे हैं।
सैयद सलार मसूद गाजी 12वीं शताब्दी के महान सूफी संत थे, जिनका मजार उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में स्थित है।
यह दरगाह एक सांप्रदायिक सौहार्द और एकता का प्रतीक मानी जाती है, जहां हर साल जेठ महीने में विशाल मेला आयोजित किया जाता है, जिसमें विभिन्न धर्मों के लोग मिलकर एकजुट होते हैं। यह मेला न केवल धार्मिक विश्वासों को साझा करने का अवसर है, बल्कि यह हिंदू-मुस्लिम सौहार्द और एकता की मिसाल पेश करता है।
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