वक्फ संशोधन बिल के समर्थन में भोपाल में हुए इन आयोजनों में न केवल पुरुष बल्कि महिलाएं भी आगे रहीं। महिलाओं ने इस विधेयक का स्वागत करते हुए अपने हाथों में पोस्टर और फूल लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार जताया। उनका कहना था कि इस विधेयक से वक्फ संपत्तियों से जुड़े विवादों में पारदर्शिता आएगी और मुस्लिम समाज के वास्तविक हितों की रक्षा होगी। भोपाल के हताई खेड़ा डैम के पास आनंदपुरा कोकता इलाके में मुस्लिम समाज के लोग बड़ी संख्या में इकट्ठा हुए। इस दौरान जश्न का माहौल देखने को मिला, जहां लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बैनर और पोस्टर लहराकर अपनी खुशी का इजहार किया। समाज के लोगों ने ढोल-नगाड़ों के साथ जुलूस निकाला और जमकर आतिशबाजी की। इस आयोजन के दौरान मुस्लिम समुदाय के प्रमुख लोगों ने कहा कि यह विधेयक समाज के उत्थान के लिए आवश्यक था और इससे वक्फ संपत्तियों से जुड़े विवादों को कम करने में मदद मिलेगी।
बुधवार को लोकसभा में वक्फ संशोधन विधेयक पेश किया जाएगा। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू इसे सदन के पटल पर रखेंगे, जिसके बाद इस पर विस्तृत चर्चा होगी। सरकार की योजना है कि इसी सत्र में इसे लोकसभा से पारित करवाकर राज्यसभा में पेश किया जाए, ताकि इसे जल्द से जल्द कानून का रूप दिया जा सके।
सरकार ने अपने सहयोगी दलों की मांगों को ध्यान में रखते हुए इस विधेयक में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन किए हैं। नए संशोधन के तहत यह प्रावधान किया गया है कि केवल वही व्यक्ति वक्फ को संपत्ति दान कर सकता है जिसने कम से कम पांच वर्षों तक इस्लाम धर्म का पालन किया हो। इससे वक्फ संपत्तियों के दान और उनके उपयोग की पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सकेगी।
इसके अलावा, वक्फ संपत्ति को लेकर किसी भी विवाद की स्थिति में अब पहले उसकी विस्तृत जांच की जाएगी और तभी कोई अंतिम निर्णय लिया जाएगा। यह संशोधन उन पुराने मामलों को ध्यान में रखकर किया गया है, जिनमें संपत्तियों के स्वामित्व को लेकर कई विवाद सामने आए थे।
एक और अहम बदलाव वक्फ बोर्ड के सदस्यों की संख्या से जुड़ा हुआ है। अब बोर्ड के पदेन सदस्य चाहे वे मुस्लिम हों या गैर-मुस्लिम, उन्हें गैर-मुस्लिम सदस्यों की गणना में शामिल नहीं किया जाएगा। इसका सीधा मतलब यह है कि अब वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या बढ़ सकती है। इस बदलाव को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों और धार्मिक संगठनों की अलग-अलग राय है, लेकिन भोपाल के मुस्लिम समाज के एक वर्ग ने इस फैसले का खुले तौर पर समर्थन किया है।
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