मल्लिकार्जुन खरगे सहित बैठक में मौजूद अधिकांश नेताओं ने इस बात पर बल दिया कि जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता को अपनाया जाना चाहिए और उनके आचरण को नियंत्रित करने के लिए एक स्पष्ट, सख्त और प्रभावी आचार संहिता तैयार की जानी चाहिए, जिसका कठोरता से पालन भी सुनिश्चित हो। यह महत्वपूर्ण बैठक राज्यसभा सभापति जगदीप धनखड़ ने मल्लिकार्जुन खरगे की सलाह और अनुरोध पर बुलाई थी। इसमें शामिल ज्यादातर नेताओं का स्पष्ट मत था कि वर्तमान में जजों की नियुक्ति की व्यवस्था में पारदर्शिता का घोर अभाव देखा जा रहा है और हाल के दिनों में रिश्वतखोरी जैसे गंभीर और चिंताजनक मामले भी प्रकाश में आए हैं, जो न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं। इसके बावजूद, सभी इस बात पर सहमत थे कि इस प्रक्रिया में कोई भी बदलाव ऐसा हो जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसके संवैधानिक अधिकारों को कमजोर न करे। फिर भी, यह विचार बार-बार सामने आया कि न्यायिक जवाबदेही को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाना अब अपरिहार्य हो गया है।
कई नेताओं ने इस दौरान सुझाव दिया कि इस संवेदनशील मामले में किसी भी जल्दबाजी से बचना चाहिए और उस तीन सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट का धैर्यपूर्वक इंतजार करना चाहिए, जिसे देश की शीर्ष न्यायपालिका ने गठित किया है ताकि तथ्यों की गहराई से पड़ताल हो सके।
बैठक में कॉलेजियम सिस्टम की खामियों और सीमाओं पर भी गहन और व्यापक चर्चा हुई, जिसमें यह बात उभरकर सामने आई कि इस व्यवस्था के तहत जज ही अपने सहयोगी जजों के नामों की सिफारिश करते हैं और केंद्र सरकार को उन प्रस्तावित नामों में से ही किसी एक को अपनी मंजूरी देनी होती है, जिससे प्रक्रिया में निष्पक्षता और विविधता का अभाव दिखता है। विपक्ष और सत्तापक्ष दोनों के सांसदों ने इस मौके पर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के गठन का विचार पेश किया, जो इस समस्या का एक संभावित समाधान हो सकता है।
केंद्र सरकार ने इस आयोग के गठन के लिए साल 2014 में एक महत्वाकांक्षी विधेयक संसद में पेश किया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक घोषित करते हुए इस पर रोक लगा दी थी। तब से लेकर अब तक यह मुद्दा सरकार और न्यायपालिका के बीच एक लंबे समय से चले आ रहे मतभेद और तनाव का प्रमुख कारण बना हुआ है। जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़ा यह ताजा प्रकरण सामने आने के बाद यह विवाद एक बार फिर से सुर्खियों में आ गया है और इसने न्यायिक सुधारों की मांग को तेज कर दिया है। कांग्रेस पार्टी के सांसदों ने इस मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए यह जोरदार मांग भी उठाई है कि जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े इस प्रकरण पर लोकसभा में विस्तृत और गहन चर्चा आयोजित की जानी चाहिए ताकि संसद इस मामले की गहराई तक जा सके और जनता के सामने सच्चाई लाई जा सके।
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