नरेंद्र मोदी के अनेक वायदों में से एक वायदा था महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment) का। 2014 से पूर्व निर्भया गैंगरेप ने पूरे देश को आक्रोशित किया था। बीजेपी ने महिलाओं को सुरक्षित वातावरण मुहैया करवाने और उन्हें सशक्त करने का वादा किया। जैसे-जैसे साल बीते वादे, दावों में बदलने लगे। अब मोदी सरकार ये दावा करती है कि वो महिलाओं को सशक्त बना चुकी है। गिनाने के लिए काग़ज़ों पर ही सही, पर कुछ नारे और योजनाएँ हैं। जैसे - बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा या फिर उज्ज्वला योजना आदि। लेकिन क्या ये नारे या योजनाएँ ज़मीन पर भी अनुदित हुईं?

जेंडर गैप इंडेक्स में भारत की स्थिति -
आँकड़े
2022 में वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम ने ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स (Global Gender Gap Index) में भारत को 146 देशों में 135वां स्थान दिया। जेंडर गैप का मतलब है पुरुषों और महिलाओं के बीच सामाजिक, राजनैतिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्थितियों में दिखने वाला अंतर। महिलाओं और पुरुषों के बीच अंतर के मामले में देश की ताज़ा रैंकिंग बताती है कि मोदी सरकार द्वारा महिला सशक्तिकरण की बातें, वादे या दावे ज़मीन पर अनुदित नहीं हुए हैं।
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2022 में वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम ने ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में भारत को 146 देशों में 135वां स्थान दिया। जेंडर गैप का मतलब है पुरुषों और महिलाओं के बीच सामाजिक, राजनैतिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्थितियों में दिखने वाला अंतर। महिलाओं और पुरुषों के बीच अंतर के मामले में देश की ताज़ा रैंकिंग बताती है कि मोदी सरकार द्वारा महिला सशक्तिकरण की बातें, वादे या दावे ज़मीन पर अनुदित नहीं हुए हैं।
ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स को तय करने के चार मुख्य पैमाने हैं -
- राजनैतिक सशक्तिकरण - इस मामले में भारत 146 देशों में 48वें स्थान पर है। लेकिन इस पैमाने पर भी इसका स्कोर बेहद कम (0.267) है।
- आर्थिक सहभागिता और अवसर - इस मामले में भारत 146 देशों की सूची में 143वें स्थान पर है। इस रैंकिंग के आंतर बिंदु हैं श्रम बल में महिलाओं की हिस्सेदारी, समान काम के लिए समान मानदेय और अर्जित आय। आर्थिक सहभागिता और अवसर के मामले में 146 देशों की सूची में देश का 143वें स्थान पर होना बताता है कि महिलाएँ आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं हैं।
- शैक्षणिक प्राप्तियाँ - इस मामले में भारत 107वें स्थान पर है। 2021 के मुक़ाबले इस मामले में देश का स्कोर घटा है। अभिप्राय ये हुआ कि साक्षरता दर के साथ-साथ प्राथमिक, माध्यमिक और वरिष्ठ माध्यमिक शिक्षा में महिलाओं का दाख़िला कम हुआ है।
- स्वास्थ्य एवं जीविता - स्वास्थ्य एवं जीविता के मामले में देश 146 देशों की सूची में अंतिम पायदान पर है। ये क्रम बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ (Save Daughter, Educate Daughter) जैसी योजना पर सवालिया निशान लगाता है।
महिला विरोधी मानसिकता का प्रसार -
पिछले कुछ सालों में महिला विरोधी बयानात की बाढ़ आई है। महिलाओं के विरुद्ध अपराध होने पर भी महिलाओं को ही ज़िम्मेदार ठहरा दिए जाने के फ़ैशन का भी विकास हुआ है। यति नरसिंहानंद (Yeti Narasimhanand) जैसे तथाकथित धर्मगुरुओं ने खुले तौर पर महिलाओं का अपमान किया। यहाँ तक कहा कि राजनीति में जो भी महिला आज किसी मुक़ाम पर है वो अनुचित काम करके ही आगे बढ़ी है। उनका कहने का आशय ये था कि महिलाएँ शरीर का प्रयोग करके और जिस्मानी संबंध बनाकर ही राजनीति में सीढ़ियाँ चढ़तीं हैं। उनके इस बयान का सरकार में शामिल महिला मंत्रियों तक ने विरोध नहीं किया। ये दर्शाता है कि पितृसत्तावादी सोच अपने चरम पर है।

महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में वृद्धि और बीजेपी नेताओं की भूमिका -
पिछले कुछ सालों में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में साल-दर-साल इज़ाफ़ा हुआ है। बलात्कारों से लेकर सोशल मीडिया ट्रोलिंग तक महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध लगातार बढ़ रहे हैं और इन अपराधों में BJP की विचारधारा से जुड़े लोगों की खुली भूमिका है। महिला पहलवानों द्वारा भाजपा सांसद पर यौन शोषण का आरोप और उस पर सरकार की चुप्पी महिलाओं के विरुद्ध सत्ता में मौजूद लोगों की सोच का परिणाम है। भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर (Kuldeep Sengar) ने किस तरह एक लड़की का बलात्कार किया, उसके बाद भी काफ़ी दिनों तक उसपर कोई कार्रवाई नहीं हुई, फिर सज़ा हुई। पीड़िता के परिजनों की मौत हुई। इस मौत में भी हत्या के आरोप कुलदीप सेंगर पर लगे। पूरा दृश्य देखने के बाद आरोप सही भी लग रहे थे। कठुआ में बलात्कार के बाद बलात्कार के आरोपियों के पक्ष में तिरंगा यात्रा निकाली गयी। मतलब राष्ट्रवाद के आवरण और राष्ट्रवादी पार्टी की आड़ में महिला विरोधी मानसिकता बल पा रही है।
अब जब मोदी को प्रधानमंत्री रहे नौ साल पूरे होने वाले हैं तब सवाल यही बचता है कि महिलाओं के लिए जो भी वादे या दावे किए जाते हैं, वो धरातल पर कब उतरेंगे?
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