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राफेल डील: राष्ट्र सुरक्षा या राष्ट्र द्रोह

राफेल डील: राष्ट्र सुरक्षा या राष्ट्र द्रोह
फोटो: राफेल डील: राष्ट्र सुरक्षा या राष्ट्र द्रोह

राफेल डील पर विरोधाभासी बयान 

राफेल डील पर चल रहा विवाद आने वाले चुनावों में भाजपा के लिए नकारात्मक साबित हो सकता है | सरकार बार बार अपने सही होने का दावा कर रही है लेकिन डील में शामिल दोनों देशों के प्रतिनिधियों का बयान सरकार के दावे को चीख चीख कर ख़ारिज कर रहा है | 

भारत की रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने 15 सितम्बर 2018 को इंडिया टीवी के इंटरव्यू में कहा कि हमने राफेल डील के लिए किसी भी कंपनी का नाम नहीं सुझाया था | यह एक व्यापारिक फैसला था और अंतर व्यापारिक संधियों में कोई नाम सुझाया भी नहीं जा सकता | जबकि फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति Francoius Hollande कहते हैं कि हमें कोई विकल्प नहीं दिया गया; रिलायंस डिफेंस लिमिटेड को इस सब में शामिल करने का सुझाव भारत सरकार का ही था | फ्रांस के वर्तमान राष्ट्रपति  Emmanuel Macron ने मामले से यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया की यह दो सरकारों के बीच का मामला है और वह उस समय सत्ता में नहीं थे| फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति और भारत की रक्षामंत्री में से कोई एक झूठ बोल रहा है | कौन और क्यों का फैसला आगे होगा लेकिन एक बात तय है कि यह झूठ भारत के लोगो के साथ धोखा और सेना के साथ विश्वासघात है | 

सरकार की नीयत पर उठ रहे सवाल 

राफेल डील भारतीय रक्षा मामलों और सुरक्षा की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण डील है | लेकिन उसकी कीमतें, पार्टनर कम्पनियाँ, सरकार और विपक्षी राजनीति राफेल को करप्शन का पर्याय बना रहे हैं | इसका हर पहलू उलझा हुआ नज़र आ रहा है; ऐसे में असलियत का अनुमान लगाना काफी मुशकिल है | 

फिर चाहे बात करें राफेल एयरक्राफ्ट की कीमतों की, या फिर राफेल डील में  HAL जैसी अनुभवी कम्पनी की जगह रिलायंस डिफेंस लिमिटेड के होने की, तर्क-वितर्क से किसी भी  सवाल का जवाब नहीं मिल रहा है और सारी उँगलियाँ उठ रही हैं भारत सरकार और इसके मुखिया प्रधान सेवक की नियत पर |

अब केवल जनता और विरोधी दल ही नहीं पार्टी के कार्यकर्ता भी जवाब मांग रहे हैं; एक इंटरव्यू में भाजपा सरकार कि करप्शन-फ्री छवि पर दाग हैं और प्रधान सेवक को इसपर खुलकर जवाब देना चाहिए | 

मुद्दे की अहम कड़ियाँ

अहम सवाल यह उठता है कि अगर UPA की सरकार ने एक एयरक्राफ्ट की कीमत 520 करोड़ रूपये लगाई थी तो मौजूदा सरकार ने लगभग तीन गुना कीमतों पर डील फाइनल क्यों की ? 

कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने सवाल उठाया कि 2015 को रिलायंस डिफेंस का गठन हुआ और 25 मार्च को डसॉल्ट के सीईओ एरिक ट्रैपर ने कहा कि HAL के साथ 95 फीसदी समझौता हो गया था तो आखिरी वक्त में HAL से छीनकर यह डील रिलायंस के झोले में कैसे डाल दी गयी?

कैसे रातों रात यह डील एचएल जैसी अनुभवी और एयरक्राफ्ट निर्माण में विशेषज्ञ कंपनी से छीनकर कर्ज़ में डूबी हुई रिलायंस को दे दी गयी?

फरवरी 2015 में रिलायंस द्वारा रक्षा के क्षेत्र में कदम रखना, पीएम के फ्रांस दौरे में अनिल अंबानी का उनके साथ जाना और एक नई नवेली कंपनी को एचएएल की जगह डील का हिस्सा बनाना - राफेल डील पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।

सरकार के जवाब का इंतज़ार

राफेल का जिक्र 1980 के दशक के बोफोर्स के समांतर किया जा रहा है, उस वक्त भी कई सवाल उठे पर हक़ीकत सामने नहीं आई। मामल दब गया। राफेल की परतें कब तक और कितनी खुलेंगी - ये वक्‍त बताएगा।

सूत्रों के आधार पर देखा जाए तो ऐसा लगता है, जैसे राफेल डील देश की सुरक्षा और सेवा की जगह मोदी सरकार के किसी स्वार्थ को पूरा कर रहा हो। राफेल की सच्चाई सरकार के स्पष्टीकरण से ही मिल सामने आ सकती है। तब तक लोगों के पास इंतज़ार के अलावा और कोई चारा नहीं है।