आज विश्व में भारत के बढ़ते प्रभाव को सरकार की विदेश नीति से निकलने वाले परिणामों पर नहीं, प्रधानमंत्री के सोशल मीडिया हैंडल से शेयर की गई तस्वीरों के ज़रिए आँका जाता है। जब भी किसी देश के मुखिया विदेश दौरे पर जाते हैं, तो सोशल मीडिया पर कई तस्वीरें साझा करते हैं। इस बार भी जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) जापान, पापुआ न्यू गिनी और ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर गए, तो उन्होंने कई तस्वीरें साझा कीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पूर्ववर्ती भी अपने विदेश दौरे की तस्वीरें साझा करते रहे हैं, इसमें कोई बुराई नहीं है। सभी देशों के नेता ऐसा करते हैं, लेकिन इन दिनों भारत की मीडिया द्वारा इन तस्वीरों के ज़रिए जो प्रचार करने की कोशिश की जाती है, उससे ऐसा लगता है कि भारत की वैश्विक स्थिति केवल नेताओं के हाथ मिलाने, गले मिलने भर से मजबूत हो जाती है। आज, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली इन बैठकों से निकलने वाले परिणामों पर चर्चा करने के बजाय मीडिया एयरपोर्ट पर नेताओं के स्वागत और उसके सम्मान में जुटने वाली भीड़ की तस्वीरें दिखाकर यह प्रचार करने का प्रयास करने की कोशिश कर रही है कि इससे भारत की स्थिति मजबूत हो रही है जबकि दो देशों के बीच के संबंधों को इन बातों के ज़रिये आंकना न सिर्फ़ गलत है बल्कि मीडिया द्वारा ऐसा प्रचारित करना भी नागरिकों को धोखे में रखना है। मीडिया का काम सरकार का प्रचार-प्रसार करना, उसका पक्ष लेना नहीं है। इस काम के लिए पहले से ही भारत सरकार के पास अपना (पीआर विभाग) जनसम्पर्क विभाग (Public Relations Department) है।

हर देश का अपने यहाँ आए दूसरे देश के नेता का स्वागत और सम्मान करने का एक प्रोटोकॉल होता है। वे अपनी धरती पर पधारे मेहमान का उस प्रोटोकॉल के तहत अभिनंदन करते हैं। भारत में भी जब किसी देश के नेता सरकारी दौरे पर आते हैं, तो निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत उनका स्वागत होता है।
निश्चित रूप से स्वागत करने की परंपरा किसी देश के प्रति दोस्ती या फिर नाराज़गी ज़ाहिर करने की परिचायक होती है लेकिन मेहमान देश के नेता के एयरपोर्ट पहुंच कर मेज़बान देश के नेता से हाथ मिलाने या गले मिलने से यह क़तई ज़ाहिर नहीं होता कि उस देश की वैश्विक स्तर पर धूम मच गई। आज का दौर ‘दिग्दिगंत-कूदन्त पत्रकारिता’ (उछलने-कूदने वाली पत्रकारिता) का दौर है। भारत का मीडिया प्रधानमंत्री के विदेश में हुए स्वागत की तस्वीरों को दिखाकर इस तरह से उछलता-कूदता है, जैसे एक बच्चा चॉकलेट मिलने के बाद ख़ुशी से उछलता है।
राष्ट्राध्यक्षों का मेज़बान देश द्वारा स्वागत करने की प्रथा को एक सामान्य परंपरा से ज़्यादा किसी अन्य रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। यह एक सामान्य परंपरा के अलावा और कुछ भी नहीं है। भारतीय मीडिया जिस तरह बड़ी-बड़ी हेडलाइन लगाकर प्रधानमंत्री की अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ हाथ मिलाने, गले मिलने, हॅंस-हॅंसकर बातचीत करने की तस्वीरों को, वैश्विक स्तर पर भारत के बढ़ते प्रभाव की तरह पेश करता है, उससे ऐसा लगता है, जैसे हाथ मिलाने भर से भारत विश्वगुरु (Vishwaguru) बन गया हो। अच्छा होगा कि तस्वीरों से भारत को विश्वगुरु बनाने वाली मीडिया, अगर इन विदेश दौरों से निकलने वाले नतीजों पर भी सार्थक चर्चा करे, न कि किसी एक व्यक्ति के अहं को संतुष्ट करने के लिए दिन-रात प्रचार में लगी रहे।

पहले, जब भारत के प्रधानमंत्री विदेश दौरों से वापस आते थे तो मीडिया उनसे सवाल करती थी, बाक़ायदा प्रेस कान्फ्रेंस तक होती थीं। उसमें मीडिया पूछती थी कि इन चर्चाओं से क्या हासिल हुआ। लेकिन पिछले नौ सालों में एक भी प्रेस वार्ता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने नहीं की। यदि वे करते तो उनसे पूछा जाता कि कोरोना और भूकंप आने के समय दवाइयाँ और अन्य जरूरतों के सामान भेजने और भारत से अच्छे रिश्ते होने के बवाजूद भी कश्मीर में होने वाली जी-20 की मीटिंग में तुर्किए क्यूँ नहीं आए ? उनसे पूछा जाता कि चीन खुले आम अरुणाचल प्रदेश को अपने देश का हिस्सा बताता है, इस पर भारत क्या कर रहा है। सवाल तो यह भी उठता कि पुलवामा हमले पर प्रधानमंत्री की क्या कोई भूमिका थी (जैसा की जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्यपाल ने आरोप लगाएँ हैं), इस पर कोई जांच होगी या नहीं मगर प्रेस-वार्ता तो दूर की बात, यहाँ तो विदेश से वापस आने के बाद प्रधानमंत्री का उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं के द्वारा फूल-मालाओं से स्वागत होता है। आपने कौन से देश में देखा है जहाँ राष्ट्राध्यक्ष विदेश दौरों से वापस आते हों और अपने देश के एयरपोर्ट पर स्वागत-सत्कार कराते हों? है न कमाल की बात?
प्रधानमंत्री का पद एक सम्मानित पद है। प्रधानमंत्री देश की जनता के प्रतिनिधि है। मीडिया से यह आशा तो की ही जानी चाहिए कि वो बेफ़िजूली की बातें करके इन महत्त्वपूर्ण पदों और उस पर आसीन लोगों की गरिमा को ठेस न पहुंचाए। प्रधानमंत्री के विदेश दौरे को सरकारी कार्यक्रम की तरह ही कवरेज दे, न कि तस्वीरों के ज़रिए ही भारत के विश्वगुरु बनने की छवि प्रस्तुत करे। इन तरीकों से भारत विश्वगुरु नहीं बन सकता। शिक्षण संस्थाओं में पढ़ाने के लिए गुरु नहीं हैं और सरकार तस्वीरों के ज़रिए भारत को विश्वगुरु बनाने चली है। मीडिया जिस तरह से इन विदेश दौरों को कवर करती है, वो तरीका सही नहीं है। मीडिया का काम सत्ता से सवाल करना है, न कि सत्ता की गोदी में जाकर बैठ जाना।
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