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रोज़गार पर युवाओं का हल्ला बोल, पर नीतीश कर रहे हैं मुद्दों को गोल!

रोज़गार पर युवाओं का हल्ला बोल, पर नीतीश कर रहे हैं मुद्दों को गोल!
फोटो: रोज़गार पर युवाओं का हल्ला बोल, पर नीतीश कर रहे हैं मुद्दों को गोल!

बिहार चुनावों के रूप में सालों बाद एक ऐसा चुनाव होता दिख रहा है, जिसमें दमदारी से नौकरियों की बात की जा रही है। इस स्थिति के लिए युवा हल्ला बोल के बोल बिहारी मुहिम की भूमिका अहम है। युवा हल्ला बोल के बोल बिहारी कैंपेन की तर्ज़ पर कांग्रेस बोले बिहार और 11 सूत्रीय एजेंडे की तर्ज़ पर बीजेपी 11 संकल्प लेकर आई। महागठबंधन के नेता रोज़गार के मुद्दे को अपने साथ चिपकाए हुए आगे बढ़ रहे हैं। ये युवाओं की और युवा हल्ला बोल के मुहिम की आंशिक जीत मानी जानी चाहिए।

 

रोज़गार के मुद्दे को अंतिम परिणिति तक पहुँचाना हो युवाओं का लक्ष्य

 

पूर्ण जीत के लिए ज़रूरी है रोज़गार के इस मुद्दे को इसकी अंतिम परिणिति तक पहुँचाना। इस स्थिति के बावजूद रोज़गार के मुद्दों को दरकिनार करने वालों को दरकिनार कर देना। एक-एक भाषण पर, एक-एख वक्तव्य पर पैनी नज़र रखना।

 

तेजस्वी के पास 10 लाख रोज़गार का ब्लू प्रिंट तैयार


महागठबंधन की तरफ से सीएम पद के उम्मीदवार तेजस्वी ने कहा कि उनके पास 10 लाख रोज़गार का ब्लूप्रिंट तैयार है। वो कहते हैं कि बिहार में 4.5 लाख सरकारी पद खाली पड़े हुए हैं। पहले उन्हें भरा जाएगा और फिर अगर सत्ता में आई तो उनकी सरकार 5.5 लाख नए अवसर पैदा करेगी। पैसों के बाबत वो कहते हैं कि लगभग राज्य के बजट का 40 प्रतिशत हिस्सा खर्च ही नहीं होता। ऐसे में कहा जा सकता है कि कमी पैसों की नहीं बल्कि नीयत की है।

 

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नीतीश भटका रहे हैं रोज़गार का मुद्दा!


दूसरी तरफ नीतीश कुमार ने एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए टिप्पणी की, "पैसा कहाँ से आएगा। घर में नकली नोट छापिएगा? या जेल से आएगा।” टिप्पणी के ज़रिए तेजस्वी यादव के उस वादे पर व्यंग्य किया जिसके अनुसार तेजस्वी चुनाव जीतने के बाद युवाओं को 10 लाख रोज़गार देंगे।

 

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पैसा कहाँ से आएगा? ज़रूरी सवाल है। इसपर सोचा जाना चाहिए। लेकिन चुनावी सभा में रोज़गार के मुद्दे पर इस तरह की बात मानसिक दिवालियेपन से अधिक कुछ और नहीं। गौरतलब है कि बिहार देश के सबसे युवा राज्यों में से एक है। 52 प्रतिशत जनसंख्या 35 वर्ष से कम उम्र की है। लेकिन
अप्रैल 2020 के अनुसार बेरोज़गारी दर 46 प्रतिशत तक पहुँच गया था।
4.5 लाख सरकारी पद खाली पड़े हैं।

 

पाँच सालों में विज्ञापनों पर खर्च किए 500 करोड़


ऐसी स्थिति इसलिए पैदा हुई क्योंकि शायद सरकार का ध्यान रोज़गार की तरफ था ही नहीं। मई 2019 में The Wire में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक 2014 से लेकर 2019 तक नीतीश कुमार की सरकार ने लगभग 500 करोड़ रुपये विज्ञापनों पर खर्च किए।


सुशील कुमार मोदी के अनुसार 10 लाख रोज़गार के लिए 5800 करोड़ रुपयों की ज़रूरत पड़ेगी। मतलब 500 करोड़ में लगभग 90000 युवाओं को रोज़गार दिया जा सकता था। लेकिन प्रचार के आगे रोज़गार की अहमियत कम पड़ गई।

 

अब जब तेजस्वी रोज़गार के झंडे को लेकर आगे बढ़ रहे हैं, जब युवा हल्ला बोल की बोल बिहारी कैंपेन ने शिक्षा, स्वास्थ्य के मुद्दों को विमर्श के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया तो नीतीश हड़बड़ा गए हैं। जानते वो भी हैं कि रोज़गार के सवालों पर उनके पास कोई जवाब नहीं है। इसीलिए वो व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोपों पर उतर गए हैं.


एक चुनावी सभा को संबोधिकत करते हुए नीतीश ने लालू के संतानों की संख्या पर तंज कसा। लालू यादव के बच्चों की संख्या पर टिप्पणी करने वाले नीतीश जी को शायद ये पता नहीं कि मोदी जी 6 भाई-बहन हैं। महिलाओं को ढ़ाल बनाकर दिए गए इस अतार्किक बयान से पहले उनका ध्यान अपने गठबंधन मित्र बीजेपी के कुलदीप सेंगर औऱ चिन्मयानंद की तरफ नहीं गया।

 

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अगर रोज़गार के सवालों के जवाब में रोज़गार के हों और 15 सालों से सीएम रहा नेता व्यक्तिगत आरोपों पर उतर आए तो पता चलता है कि मानसिक तौर पर उन्होंने हार मान ली है। नीतीश के इस तरह के आरोप और मुद्दों से उनका दुराव युवाओं को उनके अपोजिशन में खड़ा कर रहा है। चुनावों में विपक्ष की भूमिका में स्थापित हो जाना युवाओं की आंशिक जीत और रोज़गार प्रदान करने में नाकाबिल साबित हुई सरकार की मानसिक हार है।

 

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