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फ़िलिस्तीन को आतंकवाद से क्यों जोड़ रहा है मीडिया?

फ़िलिस्तीन को आतंकवाद से क्यों जोड़ रहा है मीडिया?
फोटो: फ़िलिस्तीन को आतंकवाद से क्यों जोड़ रहा है मीडिया?
फ़िलिस्तीन को लेकर इज़रायल और हमास की जंग (Israel and Hamas war) के बीच विदेश मंत्रालय ने भारत का पक्ष स्पष्ट किया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची (Arindam Bagchi) ने एक प्रेस कान्फ्रेंस में भारत के स्टैंड पर उठ रहे सवाल का जवाब दिया।


पत्रकारों को जवाब देते हुए अरिंदम बागची ने अंग्रेज़ी में जो कहा उसका हिन्दी में मतलब कुछ यूँ है। बागची ने कहा कि "भारत ने हमेशा इजरायल के साथ शांति और सुरक्षित तथा मान्यता प्राप्त सीमा के भीतर एक संप्रभु और स्वतंत्र फ़िलिस्तीन की स्थापना के लिए बातचीत की वकालत की है। फ़िलिस्तीन पर भारत की स्थिति लंबे समय से कायम और सुसंगत रही है और इस नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है।"

इससे पहले 7 अक्टूबर को गाज़ा पट्टी (Gaza Strip) से इजरायल पर हुए हमास के हमले के कुछ घंटों के भीतर ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने सोशल साइट X पर इजरायल में मारे गए लोगों और उनके परिवारों के प्रति संवेदनाएँ व्यक्त की थीं, पीएम मोदी ने एक्स पर लिखा था कि "इजराइल में आतंकवादी हमलों की खबर से गहरा सदमा पहुँचा है। हमारी संवेदनाएँ और प्रार्थनाएँ निर्दोष पीड़ितों और उनके परिवारों के साथ हैं। हम इस कठिन समय में इज़राइल के साथ एकजुटता से खड़े हैं।"

 पीएम मोदी ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Benjamin Netanyahu) से बातचीत के बाद भी एक्स पर लिखा था, "मैं प्रधानमंत्री नेतन्याहू को उनके फोन कॉल और मौजूदा स्थिति पर अपडेट देने करने के लिए धन्यवाद देता हूं। भारत के लोग इस मुश्किल घड़ी में इजराइल के साथ मजबूती से खड़े हैं। भारत आतंकवाद के सभी रूपों और अभिव्यक्तियों की कड़ी और स्पष्ट रूप से निंदा करता है।"

 भारत की नीति हमेशा से एक संप्रभु फ़िलिस्तीन राज्य की स्थापना के पक्ष में रही है। 1974 में भारत फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (Palestine Liberation Organization) को फिलिस्तीनों के एकमात्र और वैध प्रतिनिधि के तौर पर मान्यता देने वाला पहला गैर-इस्लामिक राज्य था। 1988 में भारत ने फ़िलिस्तीन को राज्य के रूप में मान्यता दी और 1996 में गाज़ा में एक दफ्तर खोला। इस दफ़्तर को 2003 में रामल्ला शिफ़्ट कर दिया गया। संयुक्त राष्ट्र महासभा (United Nations General Assembly) के 53 वें अधिवेशन में इज़रायल द्वारा बनाईं जा रही Separation Wall के खिलाफ आये प्रस्ताव का भी भारत ने समर्थन किया था।

फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास (Mahmoud Abbas) 2005, 2008, 2010 और 2012, में भारत की यात्रा पर आए थे जिसमें 2008 और 2012 की यात्रा राजकीय थी। भारत की ओर से सन 2000 में तत्कालीन गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी (Lal Krishna Advani) और विदेश मंत्री जसवंत सिंह (Jaswant Singh) फिलिस्तीन की यात्रा पर गए थे।

लेकिन क्या भारत का मीडिया इन पहलुओं को समझता है? प्राइम टाइम में वैश्विक मुद्दों पर डिबेट करने वाले गोदी मीडिया के पत्रकार भारत की विदेश नीति की जानकारी रखते हैं? हम यह सवाल इसीलिए पूछ रहे हैं क्योंकि जब से हमास ने Israel पर हमला किया है तब से गोदी मीडिया (Godi Media) लगातार इज़रायल को पीड़ित और फिलिस्तीनियों को आतंकवादी घोषित करने पर आमादा नज़र आ रहा है। यहाँ एक बात स्पष्ट कर देनी ज़रूरी है। हम आतंकवादी कार्रवाई का समर्थन नहीं कर रहे, करना भी नहीं चाहिए, मगर, इसका मतलब यह नहीं है कि हम फिलिस्तीन के नागरिकों के साथ अपनी संवेदनाएँ व्यक्त न करें।

अब युद्ध को लेकर भारतीय मीडिया द्वारा की जा रही कवरेज के सवाल पर फिर लौटते हैं। गोदी मीडिया और उनके एंकरो की खूँख्वार आवाज से ज़ाहिर है कि Israel Palestine मामले की आड़ में हिन्दू-मुस्लिम करना, धार्मिक आधार पर नफरत फैलाना ही इनका अजेंडा है।

13 अक्टूबर को जी 20 पार्लियामेंट स्पीकर की समिट (Parliament Speakers' Summit) में प्रधानमंत्री मोदी ने सच ही कहा कि "Terriorism चाहे कहीं भी होता हो, किसी भी कारण से, किसी भी रूप में होता हो, लेकिन वो मानवता के विरुद्ध होता है।" Israel पर हुए हमास के हमले को किसी भी रूप में सही नहीं ठहराया जा सकता लेकिन प्रधानमंत्री दशकों से फ़िलीस्तीन के साथ हो रहे अत्याचार के प्रति संवेदना जताना भूल गये। जबकि फ़िलिस्तीन की आज़ादी शुरू से भारत का संकल्प रहा है। क्या फ़िलिस्तीन के साथ जो हुआ, वह किसी आतंकवाद से कम है। आख़िर संयुक्त राष्ट्र संघ हमास को आज तक आतंकवादी संगठन क्यों घोषित नहीं कर सका है? यहाँ तक कि वह आतंकवाद की परिभाषा भी तय नहीं कर पाया है। क्या मीडिया में इसकी चर्चा नहीं होनी चाहिए।



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