हाथरस में एक दलित लड़की के साथ गैंगरेप हुआ, जीभ काटी गई, रीढ़ की हड्डी तोड़ी गई, आरोप लगा ठाकुर बिरादरी के चार लड़को पर, इतना सुनने के बाद उस वर्ग के सभी लोगों का खून खौल उठा, करणी सेना समेत तमाम सवर्ण दल बचाव में आ गए। पंचायते शुरु हो गई। मृत लड़की के चरित्र हनन का कोई भी मौका इन्होंने नहीं छोड़ा। ठीक इसी तरह बलिया में धीरेंद्र प्रताप सिंह ने भरी पंचायत में पुलिस के सामने एक व्यक्ति को गोली मार दिया। शुरु में लगा कि धीरेंद्र प्रताप सिंह का उनका वर्ग विरोध करेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अगले ही दिन भाजपा विधायक सुरेंद्र सिंह, करणी सेना व तमाम सवर्ण दल हत्यारे के समर्थन में आ गए।
करणी सेना वाले वैसे तो हिन्दू एकता की बात करते हैं, संस्कृति बचाने का दावा करते हैं लेकिन कोई ठाकुर वर्ग का आरोपी बनाया जाता है तो बिना एक मिनट गंवाए उसके पक्ष में खड़े हो जाते हैं। इन्हें फर्क नहीं पड़ता कि अगला पक्ष कौन है। करणी सेना के वरिष्ठ उपाध्यक्ष ध्रुव कुमार ने कहा, धीरेंद्र प्रताप सिंह को गोली चलाने के लिए मजबूर करने वाले पर कार्रवाई होनी चाहिए। आप तर्क और कुतर्क के बीच ध्रुव के बयान को किस खांचे में रखते हैं ये आपको तय करना है।
करणी सेना के अध्यक्ष वीर प्रताप सिंह वीरू ने कहा है कि वह हाथरस गैंगरेप व बलिया के आरोपी को न्याय दिलाकर रहेंगे। वह आगे कहते हैं कि जाति के आधार पर किसी के लिए सहानुभूति सुनिश्चित नहीं कर सकते। गजब बात है न, ये कह भी रहे कि जाति के आधार पर बात नहीं कर सकते लेकिन इनका दल पीड़ित के घर जाने के बजाय आरोपियों के ही घर जा रहा है। उन्हें न्याय दिलाने का वादा कर रहा है लेकिन पीड़ित पक्ष की बात नहीं कर रहा है। क्या इन्हें योगी के प्रशासन पर भरोसा नहीं, क्या इन्हें ऐसा लगता है कि पुलिस गलत कर रही है।
करणी सेना पंचायत कर रही है। आरोपियों के समर्थन में प्रदर्शन कर रही है। ये सब देखकर एक सवाल दिमाग में आता है कि जिनका ये समर्थन कर रहे हैं अगर उनका अपराध साबित हो गया तो ये क्या करेंगे? क्या ये माफी मागेंगे? क्योंकि ये सभी जिस पार्टी की विचारधारा को मानते हैं उसका इतिहास तो ऐसे मामलों में बेहद गंदा रहा है। कुलदीप सेंगर के समर्थन में जुलूस निकाला लेकिन बाद में वह बलात्कारी निकला, कठुआ गैंगरेप में भी जुलूस निकाला और बाद में गलत साबित हुए। क्या गारंटी है कि हाथरस व बलिया में इनके दावे खोखले साबित न हों। गोली चलाते वक्त का वीडियो तो पूरे देश ने देख लिया है।
न्याय की उम्मीद तब दम तोड़ देती है जब फैसला भीड़ करने लगती है। करणी सेना सिर्फ ठाकुरों की सेना बनकर रह गई है। अशिक्षा-बेरोजगारी व किसानों के मुद्दे पर ये दल कभी भी प्रदर्शन करते नहीं दिखा। थिएटर जलाने, रेल की पटरियां उखाड़ने, वैलेंटाइन डे पर लड़के लड़कियों को पीटने, गाड़ियां फूकने व बलात्कार के आरोपियों के समर्थन में पंचायत करने में ही ये दल आगे दिखाई दिया है। हाथरस की दलित बेटी क्या देश की बेटी नहीं थी, बलिया में जिसकी हत्या हुई उससे इनकी हमदर्दी क्यों दिखाई नहीं देती।
सही गलत के ऊपर उठकर सोचने की जरूरत है। ये दल समाज को बांटने और कानून के इकबाल को खत्म करने के लिए हैं। उच्च वर्ग का कोई भी आरोपी होगा तो ये एक झटके में उसके समर्थन में आ जाएंगे। दलितों के समर्थन में ये तब आएंगे जब आरोपी दूसरे धर्म का हो। अगर आपको नहीं भरोसा होता तो इनके पुराने इतिहास देख लीजिए।
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