उत्तर प्रदेश पुलिस की FIR में कप्पन पर भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के तहत राजद्रोह, धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देने और किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को उसके धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करने के लिए जान-बूझ कर और दुर्भावनापूर्ण ढंग से उकसाने के आरोप लगाए गए थे। इसी के साथ कप्पन पर PFI से कनेक्शन और हाथरस कांड में हिंसा फैलाने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे। दोहा और मस्कट में स्थित वित्तीय आतंकवादी संगठनों से लगभग 80 लाख रुपये की धनराशि प्राप्त करने का भी आरोप लगाया गया था और मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप भी इसमें शामिल किया गया था।
इसी मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में इलाहाबाद कोर्ट ने सुनवाई करते हुए कहा कि कप्पन के बैंक अकाउंट में केवल 5 हजार रुपए ट्रांसफर हुए हैं, ऐसे में मनी लॉन्ड्रिंग का कोई केस बनता ही नहीं है। मनी लॉन्ड्रिंग के केस में ही ज़मानत पर कप्पल 2 फरवरी को जेल से बाहर आए हैं। पिछले साल सितंबर में उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने सभी मामलों में जमानत दे दी थी। केवल मनी लॉन्ड्रिंग में जमानत नहीं मिली, जिसकी वजह से वो अभी तक जेल में थे, लेकिन अब उन्हें मनी लॉंड्रिंग में भी जमानत मिल गई।

पत्रकार सिद्दिकी कप्पन ने जेल से बाहर आकर पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि हाथरस मामले की रिपोर्ट करने के लिए उत्तर प्रदेश आया था। इसमें गलत क्या था? मेरे पास केवल एक लैपटाप और मोबाइल फोन के अलावा पेन और नोट बुक थी। ऐसा कुछ नहीं था जो गलत कहा जा सकता था लेकिन फिर भी उसे जेल में रहना पड़ गया।
आपको बात दे कि कप्पन को जमानत मिलने के 40 दिन बाद जेल से रिहा किया गया। कप्पन ने बाहर आकर कहा कि "जमानत मिलने में मीडिया का भी बड़ा सहयोग रहा है। उन्होंने इतने महीने तक मुझे लोगों के बीच जींदा रखा, इसके लिए मैं इनका शुक्रगुजार हूं।"
कप्पन की जमानत के साथ ही कई सवाल उठते हैं कि अगर पत्रकार किसी के साथ हुए अत्याचार को लेकर आवाज उठाने की कोशिश करेगा तो पुलिस उसी पर कानून- व्यवस्था खराब करने का आरोप लगाकर उसे जेल में डाल देगी ! क्योंकि पुलिस के दावों और आरोपों में अगर सबूत और सच्चाई होती तो सिद्दिकी को जमानत देते हुए कोर्ट ये नहीं कहना पड़ता कि "मनी लॉन्ड्रिंग का केस बनता ही नहीं है।"

पत्रकार सिद्दिकी को गिरफ्तार करवाने से किसको फायदा हुआ था ? सवाल को घेरे में सीधे उत्तर प्रदेश की योगी सरकार भी आती है।
वैसे UAPA के तहत गिरफ्तार होने के बाद बरी होने वाले पत्रकार सिद्दिकी कप्पन पहला व्यक्ति नहीं है। इससे पहले भी जामिया मिलिया इस्लामिया की छात्रा सफूरा जरगर को UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया था। पत्रकार मोहम्मद जुबैर, डॉ. कफील खान पर भी UAPA और NSA लगाया, जम्मू-कश्मीर के भी कई पत्रकारों पर UAPA लगाया गया।

वहीं राज्यसभा में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने बताया कि साल 2016-2022 के दौरान UAPA के तहत कुल 5 हजार 27 मामले दर्ज किए गए थे और गिरफ्तार होने वाले लोगों की संख्या 24,134 थी। केंद्रीय मंत्री ने बताया कि इस कानून के तहत जिन लोगों के खिलाफ केस चलाया गया, उनमें से 212 आरोपियों को दोषी ठहराया गया और 386 को रिहा कर दिया गया।

इससे पता चलता है कि UAPA के तहत 2016-22 में जितने केस दर्ज हुए हैं, उनमें से केवल 212 लोग ही दोषी ठहराया गया। वहीं अभी तक 386 रिहा कर दिया गया। यहां कोर्ट इन लोगों को रिहा कर देती है। लेकिन इस बीच इन लोगों का जेल में जो समय बर्बाद हुआ है, उसकी भरपाई कौन करेगा ?
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