सपा नेता आजम खान मानसिक विकलांगताओं की तमाम हदों को पार करके शर्म और लानत को दफनाते हुए नज़र आए। जया प्रदा पर टिप्पणी करते हुए आजम ख़ान ने कहा कि वे ख़ाकी अण्डरवीयर पहनती हैं। सपा-बसपा महागठबंधन के ज़रिए लोकतंत्र को बचाने की कोशिश करने के दावे करते हैं। क्या ऐसे बचेगा लोकतंत्र?
दरअसल भारतीय राजनीति में महिलाओं का असम्मान नई बात नहीं है। बड़ी से बड़ी नेता अभद्र टिप्पणियों का शिकार होती रही हैं। लेकिन किसी भी राजनेता में वह ताकत नहीं दिखता जो मुखर होकर महिलाओं के सम्मान के पक्ष में बोलता हो।
जयाप्रदा रामपुर की शामें रंगीन कर देंगी और लोगों को मज़ा देंगी। मायावती फेशियल करवाती हैं। सपना चौधरी के रूप में सोनिया गाँधी को अपनी बहु मिल गई है। सोशल मीडिया पर इंदिरा गाँधी से लेकर सोनिया गाँधी और प्रियंका गाँधी तक का चरित्र हनन आम है। सपा नेता फ़िरोज़ ख़ान से लेकर बीजेपी के सुरेंद्र सिंह तोमर तक सब अपनी गिरी हुई सोच का परिचय देते रहे हैं।
चुने हुए प्रतिनिधियों के ये बयान बताते हैं कि आखिर क्यों महिला आरक्षण बिल 20 साल से अटका हुआ है। 1996 में देवगौड़ा सरकार ने पहली बार ये बिल पेश किया तो कई पुरुष सांसदों ने इसका विरोध किया। 2010 में राज्यसभा में बिल पास हुआ लेकिन लोकसभा में इसकी कॉपी तक फाड़ दी गयी। उस समये संसद में किसी दल के पास बहुमत नहीं था। लेकिन आज जब स्पष्ट बहुमत है सरकार के पास फिर भी महिला आरक्षण बिल पास न हो पाने का कारण राजनैतिक दलों के पुरुष प्रतिनिधियों की इच्छाशक्ति है।
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के नारे के साथ जिस देश में पार्टियाँ सत्ता हासिल करती हों उस देश में चुने हुए प्रतिनिधियों के ये बयान लोगों के गालों पर तमाचा है। निर्भया के बलात्कार के बाद पूरा देश एकत्रित हुआ और पूरे देश के विरोध को सुर दिया बीजेपी ने। लोगों ने विश्वास दिखाया। सत्ता सौंपी लेकिन उन्हें मिला क्या।
पार्टी का विधायक बलात्कार के आरोपों में घिरा हुआ है। पार्टी का दूसरा विधायक कहता है कि 2 बच्चों की माँ के साथ कौन बलात्कार करेगा। पार्टी के कई अन्य लोग महिलाओं के विरुद्ध टिप्पणियाँ करते हुए दिखते हैं। पर महिलाओं के विरुद्ध अपराध रोकने और महिलाओं को पढ़ने और बढ़ने के अवसर मुहैय्या कराने के नाम पर सत्ता में आए नरेंद्र मोदी इन बयानों पर ख़ामोश रहते हैं।
यही हाल अन्य राजनैतिक पार्टियों का भी है। अखिलेश यादव जो नई राजनीति का दंभ भरते हैं, जिनके परिवार से एक बड़ी महिला सांसद आती हैं, खुद उनकी पार्टी के नेता महिला नेत्रियों के खिलाफ बयान दे रहे हैं। ये वही पार्टी है जिससे औरतों के हक में आवाज़ उठाने वाली जया बच्चन तआल्लुक़ रखती हैं।
दरअसल, महिलाओं के खिलाफ़ ये बयानबाज़ी केवल राजनैतिक द्वेष नहीं बल्कि सामाजिक संरचना का एक उदाहरण है। महिलाओं को हमेशा एक वस्तु समझा गया है और आज भी समझा जा रहा है।
दुर्भाग्य ये है कि जिन महिलाओं को अवसर मिला वे भी इस संरचना को तोड़ पाने की कोशिशों में विफल रही फिर चाहे वो स्मृति ईरानी हों, हेमा मालिनी हों, किरण खेर हों या जया बच्चन!

