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"क्या किसान आज़ाद नहीं हैं?" - वो सात डर जिनके कारण किसान कर रहे हैं आंदोलन!

"क्या किसान आज़ाद नहीं हैं?" - वो सात डर जिनके कारण किसान कर रहे हैं आंदोलन!
फोटो: "क्या किसान आज़ाद नहीं हैं?" - वो सात डर जिनके कारण किसान कर रहे हैं आंदोलन!

25 तारीख़ से लेकर 27 तारीख़ तक हरियाणा की सीमाएँ बंद कर दी गईं हैं। हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर ने कहा है कि वो चाहते हैं कि किसान प्रदर्शन न करें क्योंकि ताज़ा-ताज़ा पास किए गए तीनों क़ानून उनके पक्ष में है। यहाँ कुछ सवाल उठते हैं। जैसे अगर क़ानून, किसानों के पक्ष में है तो किसानों को ऐसा लग क्यों नहीं रहा? क्यों वो आंदोलन कर रहे हैं? क्यों सरकार उनसे सीधा संवाद नहीं कर रही? ये तो ऐसा है जैसे पुरानी फ़िल्मों में विलेन बाप या भाई अपनी बेटी या बहन की शादी अपने किसी गुंडे दोस्त से तय कर देते थे और सवाल पूछने पर कहते थे कि हम जो फ़ैसला ले रहे हैं वो तुम्हारे भले में है। चुप रहो और चुपचाप मान लो।

बहरहाल, पंजाब में 2 महीनों से किसान अप्रतिम आंदोलन कर रहे हैं। अपने हक़ों के लिए। इसके बाद क़रीब 500 किसान संगठन एकजुट हुए, एक संयुक्त मोर्चा बनाया और 26 नवंबर को दिल्ली चलो का नारा दिया। कोरोनावायरस का समय था, सो तय किया गया कि पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड से किसान दिल्ली की ओर कूच करेंगे। लेकिन हरियाणा सरकार ने क्या किया? - पहले सीमाएँ सील कीं और फिर किसान नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। अब तक 50 से अधिक किसान नेता गिरफ्तार किए जा चुके हैं।

हरियाणा के सीएम ने सीमा सील कर दी है और लोगों से 25 से 27 नवंबर तक सीमा पर न आने की अपील कर रहे हैं। वहीं दिल्ली पुलिस ने 24 नवंबर को ट्वीट किया कि प्रदर्शन करने की अनुमति को ख़ारिज किया जा चुका है। अगर इसके बावजूद वो प्रदर्शन करते हैं तो उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई होगी।

अधिकार है क़ानून को कार्रवाई करने का। लेकिन अधिकार तो किसानों को भी है आज़ाद रहने का। किसान संगठनों का यही कहना है कि तीन कृषि बिल जिनका विरोध किया जा रहा है वो किसानों की आज़ादी छीन लेंगे। गुलाम बना छोड़ेंगे वो उन्हें कॉरपोरेट का।

योगेंद्र यादव सात डरों का ज़िक्र करते हैं। वो कहते हैं कि सरकार किसानों को सात तरफ़ से घेरने की तैयारी कर रही है। ये सात बंदिशें हैं - 

मंडी बंदी -
नए क़ानून के तहत कोई भी किसान किसी भी खरीददार को कहीं भी अपना अनाज बेच सकता है। सपना दिखाने के लिहाज़ से ये अच्छा है कि मार्केट का साइज़ बड़ा होगा। लेकिन व्यावहारिक तौर पर ठीक नहीं है। कितने किसान अपने अनाज को लेकर बाहर जा पाएँगे? दरअसल, इस क़ानून के कारण धीरे-धीरे मंडियाँ बैठ जाएगी और किसानों को डर है कि जो एक सहारा उनके पास हुआ करता था वो उनसे छिन जाएगा।

MSP बंदी -
मंडी नहीं तो MSP नहीं। सरकार कहती है कि मंडियों के बाहर सामान बेचने से आपको बेहतर कीमतें मिल पाएंगी जो आप तय करेंगे, लेकिन किसानों का डर है कि उन्हें MSP भी नहीं मिल पाएगी।सरकार लिखकर दे दे कि MSP पर खरीद सरकार करेगी ही। सरकार कभी कोई कानून लाकर MSP बंद कर देने की घोषणा नहीं करेगी, बल्कि अलग-अलग कानूनों से ऐसी स्थितियाँ बनेंगी, जिससे पहले मंडी में खरीद-बिक्री बंद होगी और फिर MSP लगभग अव्यावहारिक बनकर रह जाएगी।

राशन बंदी -
दरअसल सरकारी राशन की दुकानों पर अति गरीब वर्ग के लोग कम क़ीमतों पर ज़रूरत का सामान ख़रीद सकते हैं। लेकिन जब सरकार एक तरीक़े से किसानी को कॉरपोरेटाइज़ कर रही है, तो धीरे-धीरे इन सरकार दुकानों का अस्तित्व ख़त्म हो जाएगा। सरकार ख़रीदेगी ही नहीं, तो बेचेगी कैसे? 

कांट्रेक्ट खेती से क़िस्मत बंदी -
सरकार कांट्रेक्ट खेती को बढ़ावा देना चाहती है। किसानों को डर है कि कांट्रेक्ट खेती के कारण वो कॉरपोरेट के गुलाम बनकर रह जाएँगे। कॉर्पोरेट की मर्ज़ी पर जीने को मजबूर हो जाएँगे। सरकार का तर्क है कि कांट्रेक्ट की शर्तें तय करने में किसानों की भी भूमिका होगी। लेकिन समझना ज़्यादा मुश्किल नहीं है कि किसान, बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों के ख़िलाफ़ अदालत में कैसे संघर्ष करेंगे!

जमाख़ोरी और कालाबाज़ारी पर रोक-टोक की बंदी -
नए क़ानून के तहत सरकार ने जमाख़ोरी या कालाबाज़ारी पर से प्रतिबंध हटा दिया है। किसानों को डर है कि इसके कारण उनका सामान तो सस्ते दामों पर ख़रीद लिया जाएगा लेकिन जब अंतिम ग्राहकों तक ये सामान पहुँचेगा तब इनकी क़ीमतें आसमान छूएंगी।

सस्ती बिजली बंदी -
योगेंद्र यादव कहते हैं कि केंद्र सरकार आख़िर क्यों राज्य सरकारों को किसानों को सस्ती बिजली देने से रोक रही है। किसानों के मन में इस बात का भी ख़ौफ़ है।

पराली के ख़िलाफ़ क़ानून से किसान की आज़ादी बंदी -
क्या पराली, प्रदूषण का एकमात्र कारण है? नहीं न, अगर नहीं तो पराली के ख़िलाफ़ क़ानून बनाकर किसानों की धड़पकड़ क्यों हो रही है? बड़े-बड़े कारख़ानों, कंस्ट्रक्शन साइट्स, गाड़ियों पर नियंत्रण का कोई क़ानून क्यों नहीं बनाया जा रहा है? क्या किसान सरकारों का सॉफ़्ट टारगेट बन गया है? किसान के मन में फ़िलहाल यही भाव है, कि वो सरकारों के लिए एक सॉफ़्ट टार्गेट बन गया है।

बहरहाल अपने इन सात डरों से लड़ते हुए अब किसान अंतिम संघर्ष चाहते हैं, जिसमें वो संविधान में प्रदत्त अपने अधिकारों की रक्षा कर सकें। किसानों का ये संघर्ष उनके गरिमामयी जीवन जीने के उनके अधिकार का संघर्ष है।