दिल्ली में जो हो रहा है, वो कोई दंगा नहीं है। ये दो राजनीतिक पार्टियों के निजी प्रयोगों का बाई-प्रोडक्ट है। घर जल रहे हैं, गाड़ियां तोड़ी जा रहीं हैं, लोग मारे जा रहे हैं- ये सबकुछ प्रयोग करने वाली दोनों पार्टियों को पता रहा ही होगा।
दिल्ली में ये प्रयोग बीजेपी और आम आदमी पार्टी कर रही हैं। AAP अन्य मुद्दों को हावी करके विचारधारा के मुख्य मुद्दे से ध्यान भटकाना चाहती है। चुनाव से पहले भी आम आदमी पार्टी शाहीन बाग़, CAA आदि को लेकर लगभग उदासीन बनी रही। उसने बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दों को खूब प्रचारित किया। लेकिन विचारधारा के स्तर पर बीजेपी को वॉकओवर दिया। चुनावों के बाद भी आप यही कर रही है। भीषण हिंसा में सात लोगों की मौत के बाद केजरीवाल ने कहा कि वो अस्पतालों और फायर ब्रिगेड की व्यवस्थाओं को ठीक रखेंगे। उसने मुखर होकर अतिवाद की आलोचना नहीं की।
वहीं बीजेपी विचारधारा के मुद्दे को ही उछाल रही है, अन्य मुद्दों को छोड़कर। चुनाव से पहले भी उसने यही काम किया था और चुनावों के बाद भी यह काम बदस्तूर जारी है। चुनाव से पहले अमित शाह समेत अन्य तमाम नेता भड़काऊ बयान देते रहे और चुनाव के बाद कपिल मिश्रा ने कमान संभाल ली।
चुनावों के दौरान दोनों ही सरकारें अपने-अपने प्रयोगों में कामयाब रहीं। आम आदमी पार्टी चुनाव जीतकर सत्ता में काबिज़ हो गई और बीजेपी ने अपने वोटबैंक में इज़ाफ़ा कर लिया। और इसी कामयाबी ने उन्हें अपने प्रयोगों को जारी रखने की प्रेरणा दी।
इन प्रयोगों से दोनों ही पार्टियों के प्रयोजन हो सकते हैं-
1. मुसलमानों का एक बड़ा तबका इतना डर जाएगा कि इनके अलावा हमारा और है कौन... की मानसिकता के साथ आप को एकतरफ़ा वोट करेगा।
2. हिंदुओं की बड़ी जनसंख्या अपने हृदय सम्राट की पहचान कर चुकी होगी।
दिल्ली में खेल केवल इन्हीं दोनों के बीच का होगा। दोनों के हित टकराएंगे भी नहीं। 'राम' के सम्मुख 'हनुमान' अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र पर राज भी कर रहे होंगे और राम के ख़िलाफ़ किसी और को खड़ा भी नहीं होने देंगे।

