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अंतर्कलहों में उलझी कांग्रेस के लिए बीजेपी से जीतना मुश्किल

अंतर्कलहों में उलझी कांग्रेस के लिए बीजेपी से जीतना मुश्किल
फोटो: अंतर्कलहों में उलझी कांग्रेस के लिए बीजेपी से जीतना मुश्किल

किसे चुनें, किसे न चुनें - कांग्रेस एक ऐसे सवाल के बीच में फँस रही है, जिसके लिए उसके पास बिल्कुल भी समय नहीं। गुजरात में सबसे बड़े नेता शंकर सिंह वाघेला ने जिस तरह से कांग्रेस से दूरी बनाई वो सबने देखा। पंजाब में कैप्टन अमरिंदर और कांग्रेस के बीच फ़ासला हर किसी ने महसूस किया। पंजाब में तो सत्ता मिल गई लेकिन गुजरात लगातार पाँचवी बार हार गए। हरियाणा में अशोक तँवर-भूपेंद्र सिंह हुड्डा, मध्य प्रदेश में कमलनाथ-ज्योतिरादित्य सिंधिया या राजस्थान में अशोक गहलोत-सचिन पायलट-सीपी जोशी, कांग्रेस किसे छोड़ दे और किसके साथ आगे बढ़े इस उलझन में फँस गई है। दरअसल कांग्रेस की नाव में खुद नाविक ही छेद कर रहे हैं।

कहते हैं जब चुनौती बड़ी होती है, तो अपने अंदर की ताकत को एक जगह केंद्रित करके उसका सामना करना चाहिए। यह बात तब भी लागू होती है, जब आप एख दल के रूप में किसी चुनौती का सामना कर रहे हों। वर्तमान भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में सभी राजनैतिक दलों के लिए भारतीय जनता पार्टी ऐसी ही एक चुनौती बनकर उभर रही है। राष्ट्रीय राजनीति से लेकर क्षेत्रीय राजनीति तक इसने अपने प्रतिद्वंद्वी, मुख्य रूप से कांग्रेस को कोसों पीछे छोड़ दिया है। 

वहीं दूसरी ओर कांग्रेस लगातार चुनाव दर चुनाव पीछे होती जा रही है। कभी कभी की घटनाओं को छोड़ दें तो कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व ओजविहीन नज़र आता है। कांग्रेस की राष्ट्रीय या क्षेत्रीय राजनीति किसी भी तरह की उम्मीद नहीं जगाती। और इसका सबसे बड़ा कारण है ने कांग्रेस के अंदर नेतागिरी की होड़ जो कि समझ से परे है। 

नेताओं के अंतर्कलह से जूझ रही है कांग्रेस

जब भी केंद्रीय नेतृत्व की बात होती है तो थक-हार कर नज़रें गाँधी-नेहरु परिवार पर ही टिक जाती हैं। राष्ट्रीय स्तर पर आम लोगों के लिए इस परिवार से इतर कांग्रेस के पाँच नेताओं का नाम बता पाना मुश्किल होगा। इस बारे में पूछे जाने पर कांग्रेस नेता पनी पूरी श्रद्धा और समर्पण उस नेतृत्व के लिए ज़ाहिर करते हैं। लेकिन बात जैसे ही क्षेत्रीय राजनीति की आती है, नेतृत्व उलझन का सबब बन जाती है। या तो कांग्रेस दूसरों को बैसाखी बना कर सफर कर रही है या फिर अपने ही नेताओं के अंतर्कलह से जूझ रही है।

रथ और साइकिल की लड़ाई में उलझी हरियाणा कांग्रेस

हरियाणा इस समय, सबसे आसान रणक्षेत्र है। लोग खट्टर सरकार के कामों से खुश नहीं दिख रहे। मनोहर लाल खट्टर के अब तक के कार्यकाल में प्रदेश दो-तीन बार हिंसा की आग में झुलस चुका है। अपराध लगातार बढ़ रहे हैं। ऑफिसर्स और मंत्रियों के बीच का तारतम्य खराब है। ऐसे में कांग्रेस के पास सत्ता में वापसी का मौका है, लेकिन कांग्रेस रथ और साइकिल की लड़ाई में उलझ गई है। प्रदेशाध्यक्ष अपनी डफली बजा रहे हैं तो पूर्व मुख्यमंत्री अपनी। जहाँ कांग्रेस को बीजेपी, या इनेलो के विरुद्ध लड़ना चाहिए, वहाँ लड़ाई कांग्रेस के दो गुटों के बीच हो रही है। कभी-कभी एक तीसरा या चौथा गुट भी सामने आ जाता है। आलम ये है कि अलग अलग गुटों के कार्यकर्ता अपने अपने नेताओं को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बताते हैं और दूसरे का मानमर्दन करते हैं।

मध्य प्रदेश - कमलनाथ या सिंधिया?

शिवराज सरकार के राज में मध्य प्रदेश में बढ़ता भ्रष्टाचार, अपराध, किसानों का रोष एक स्वर्णिम अवसर को जन्म देता है। लेकिन कांग्रेस यहाँ भी घर की लड़ाई में उलझती दिख रही है। ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ के बीच अहं और नेतृत्व की लड़ाई कांग्रेस को चुनावी मैदान में कमज़ोर कर सकती है। संभव है कि दो बिल्लियों के बीच की लड़ाई में तीसरी बिल्ली बाज़ी मार जाए और शिवराज भारी एंटी-इनकंबेंसी के बावज़ूद एक बार फिर सत्ता में आएँ।

सचिन या अशोक - कौन होगा राजस्थान का पायलट?

राजस्थान अपनी राजनैतिक वफ़ादारी के लिए जाना जाता है। 1993 से लेकर आजतक एक बार बीजेपी, दूसरी बार कांग्रेस- यह राजस्थान का ट्रेंड रहा है। वसुंधरा राज में राज्य में अपराधों ने सारी सीमाएं पार कर दी हैं। चाहे महिलाओं के विरुद्ध अपराध हो या जातीय आधार पर किया जाने वाला हेट क्राइम - राजस्थान शर्मनाक कीर्तिमान स्थापित कर रहा है।  सामान्य स्थितियों में राजस्थान के लोग दोबार बीजेपी को चुनें यह मुश्किल ज़रूर है लेकिन कांग्रेस के घर का झगड़ा इस राह को आसान कर सकती है। अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच की लड़ाई से जूझ रही कांग्रेस के लिए सीपी जोशी ने अपने जन्मदिवस पर नई मुसीबत खड़ी कर दी है। कहा जा रहा है कि जन्मदिवस के जलसे की आड़ में जोशी ने शक्ति प्रदर्शन किया जहाँ उनके समर्थकों ने उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया। अब कांग्रेस किसे अपनाए, किसे समझाए और किसे नाराज़ कराए - यह तय करना उसके लिए अहम हो गया है।

दूसरों की बैसाखियों पर लड़ती कांग्रेस

बिहार, उत्तर प्रदेश या पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का कोई चेहरा नज़र आता नहीं। बिहार में कांग्रेस लालू एंड फैमिली तो यूपी में अखिलेश यादव के नाव पर चुनाव का दरिया पार करने की कोशिशें कर रही है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के दामन में छुपने की कोशिश कर सकती है। कहा जा सकता है कि कांग्रेस अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। शीर्ष नेतृत्व अहम निर्धारण नहीं कर पा रहा और संगठन के प्रचार-प्रसार पर कोई ख़ास रणनीति दिख नहीं रही। इस तरह से बिखरी-बिखरी कांग्रेस विश्व के सबसे बड़े संगठन के आधार वाली बीजेपी को हरा सके - इसके आसार कम हैं।