उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए अब महज तीन महीने बचे हैं। ऐसे में सियासी पार्टियां जनता के बीच अपने पूरे दमखम के साथ प्रचार में जुटी हैं। भाजपा जहां लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी के लिए जुटी है वहीं सपा और बसपा अपने पुराने इतिहास को दोहराने की कोशिश में गोलबंदी कर रहे हैं। कांग्रेस अपने वजूद को स्थापित करने के लिए संघर्ष करती नजर आ रही है।
कभी कांसे और पीतल के बर्तनों के लिए मशहूर कौशांबी जिले की चायल सीट पर इसबार भी मुकाबला रोचक नजर आ रहा है। यहां के वर्तमान भाजपा विधायक संजय गुप्ता को ही पार्टी यहां से अपना प्रत्याशी बनाएगी ऐसे में लोकल स्तर पर भाजपा के बीच किसी तरह का मतभेद नजर नहीं आता। वहीं दूसरी तरफ सपा से 2012 में प्रत्याशी रहे चंद्रबली पटेल, गुलाम हुसैन, आस्था पटेल, राकेश सिंह भोला जैसे कई और नेता टिकट की दावेदारी करते नजर आ रहे हैं। बसपा अतुल द्विवेदी पर तो कांग्रेस रजनीश पांडे पर दांव लगा सकती है।
चायल सीट के इतिहास की बात करें तो यह सीट 1951 के चुनाव में सामान्य थी, यहां उस वक्त कांग्रेस के सैय्यद मुजफ्फर हुसैन ने जीत दर्ज की थी। 1956 के चुनाव में भी यहां मुजफ्फर हुसैन ने जीत दर्ज की। 1962 से यह सीट आरक्षित हो गई। 2012 तक दलित प्रत्याशी ही चुनाव लड़ते रहे। 2012 में नए परिसीमन के तहत सीट सामान्य हुई लेकिन जातीय समीकरण ऐसा बना कि बसपा के आसिफ जाफरी ने सपा प्रत्याशी चंद्रबली पटेल को मामूली अंतर से हरा दिया। 2017 के चुनाव में यहां भाजपा ने सामान्य वर्ग से आने वाले संजय गुप्ता को मैदान में उतारा तो उन्होंने सपा-कांग्रेस गठबंधन के प्रत्याशी तलत अजीम को दोगुने वोटों के अंतर से हरा दिया।
2022 के चुनाव की जमीनी हकीकत को समझने के लिए हम जब विधानसभा के ही दरवशपुर गांव पहुुंचे तो वहां विधायक संजय गुप्ता के काम को लेकर लोगों के भीतर संतुष्टि दिखी। अरुण कुशवाहा ने बताया कि विधायक संजय गुप्ता ने कभी किसी काम के लिए न नहीं कहा। विकास कार्यों को लेकर वह खुद ही पहल करते नजर आते हैं। हम काजू, मौली और समसपुर गांव में भी गए जहां संजय गुप्ता को लेकर विरोध के स्वर बेहद कम सुनाई दिए।
महिमा पटेल ने बताया कि विधायक द्वारा मेरी बेटी-मेरा स्वाभिमान अभियान बेहद प्रेरक है, वह हर संभव मदद के लिए हमेशा तैयार दिखते हैं, अभी मेरे ही गांव की कुछ लड़कियों को साइकिल व एक लैपटॉप दिया था। हालांकि गांव के ही युवाओं के भीतर महंगाई को लेकर भाजपा के प्रति नाराजगी है, उनसे पूछा कि क्या इसका असर विधायक के समर्थन पर पड़ेगा तो उनका जवाब था कि अगर केंद्र और राज्य सरकार महंगाई पर किसी तरह अंकुश नहीं लगाती तो योग्य प्रत्याशियों को भी नुकसान उठाना पड़ेगा।
इस सीट पर करीब सवा लाख दलित मतदाता हैं इसके बाद पिछड़ी जाति के वोटर हैं, मुस्लिम मतदाताओं की संख्या यहां 50 हजार के करीब है, सवर्ण और वैश्य मतदाता लगभग बराबर हैं। इस सीट पर यही सवर्ण और वैश्य मतदाता लंबे समय से प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला करते आए हैं। कांग्रेस और बसपा यहां सवर्ण प्रत्याशी उतारकर इसी वर्ग के वोट को अपने पाले में खींचना चाहती हैं लेकिन अभी जो हालात हैं दोनो ही वर्ग भाजपा से जुड़े हुए नजर आते हैं।
खास बात ये कि यहां कोई ऐसा बाहुबली टाइप नेता नहीं है जो 10-12 हजार वोट को भी प्रभावित कर सके, लंबे वक्त तक लोग पार्टी देखकर वोट डालते रहे हैं। लेकिन इस बार व्यक्तित्व पर भी लोगों की नजर है, इसकी बड़ी वजह संजय गुप्ता हैं। क्षेत्र में संजय की पहचान सहज, सरल व्यक्ति के रूप में स्थापित हो चुकी है। ऐसे में दूसरी पार्टियों के प्रत्याशियों का मुकाबला न सिर्फ भाजपा से है बल्कि संजय गुप्ता की छवि से भी है। फिलहाल यहां इस वक्त मुकाबला एकतरफा नजर आ रहा है।

