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पूंजीपतियों के 'प्राइवेट मिनिस्टर' बने PM मोदी? आठ मंत्रालयों की संपत्ति निजी कंपनियों को देने का प्लान

पूंजीपतियों के 'प्राइवेट मिनिस्टर' बने PM मोदी? आठ मंत्रालयों की संपत्ति निजी कंपनियों को देने का प्लान
फोटो: पूंजीपतियों के 'प्राइवेट मिनिस्टर' बने PM मोदी? आठ मंत्रालयों की संपत्ति निजी कंपनियों को देने का प्लान

पहले की सरकारों की प्राथमिकताओं में सरकारी संस्थान होते थे, उनकी मजबूती और विकास को ही सरकार देश का विकास बताती थी लेकिन वर्तमान मोदी सरकार इससे अलग हटकर चल रही है, देश नहीं बिकने दूंगा' का नारा देकर सत्ता में आए नरेंद्र मोदी की सरकार एक के बाद एक सरकारी संपत्तिया निजी हाथों में सौंप रही  हैं। 

 

केंद्र सरकार के आठ मंत्रालयों ने उन संपत्तियां की सूची बनाई है, जिन्हें बेच दिया जाएगा या निजी क्षेत्र को देकर पैसा कमाया जाएगा। सरकार इस योजना को अमल में लाकर करीब 2.5 लाख करोड़ रुपए जुटाने का लक्ष्य बना चुकी है। इसमें बिजली, सड़क, रेलवे स्टेशन, रेलवे पटरियां, दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद में एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के साथ ज्वाइंट वेंचर में चलाए जा रहे एयरपोर्ट्स की इक्विटी हिस्सेदारी भी है, साथ ही दिल्ली में मौजूदा जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम जैसे मैदानों को लीज पर दिए जाने का प्लान भी तैयार किया गया है। 

 

इस योजना के तहत एमटीएनल और बीएसएनल को भी निजी हाथों में सौंप दिया जाएगा जिससे सरकार 40 हजार करोड़ रुपए कमाएगी। 7,200 किलोमीटर सड़क भी निजी कंपनियां खरीद लेंगी जिसके बाद कंपनियां उस पर मन मुताबिक टोल टैक्स लगा कर पैसे कमाएगी। ऐसे ही स्टेडियम का रखरखाव निजी कंपनियां करेंगी और वही उससे पैसे भी कमाएंगी। पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्रालय इंडिन ऑयल, हिन्दुस्तान पेट्रोलियम और गैस अथॉरिटी को प्राइवेट हाथों में सौंप कर 17 हजार करोड़ कमाना चाहता है। 

 

सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण के खिलाफ आम जनता में गुस्सा है, गुस्सा जायज भी नजर आता है। निजीकरण के मामले पर भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी का कहना है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का नेत्रहीन रूप से निजीकरण करना अच्छी बात नहीं है, सरकार की नीतियां गलत हैं। कल जहां बैंक कर्मी सड़क पर थे तो आज ट्विटर पर सरकार का विरोध किया जा रहा है, #PvtPMOLtd ट्विटर पर ट्रेंड कर रहा है, प्रधानमंत्री को अंबानी-अडानी के साथ जोड़ा जा रहा। 

 

क्या जनता का यह कहना सही है कि PM मतलब प्राइम मिनिस्टर नहीं प्राइवेट मिनिस्टर ऑफ अंबानी-अडानी है? क्या यह कहना सही है कि 7 सालों में देश जितना मोदीराज में बर्बाद हुआ उतना कभी नहीं हुआ? 


निजी हाथों में कंपनियों को सौंपने केे पीछे सरकार कहती है कि इससे भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी, क्योंकि सरकारी कंपनियों में लापरवाही और भ्रष्टाचार अधिक है। सुनने में ये बात तो सही लगेगी लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। यस बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, लक्ष्मी विलास बैंक में बड़े स्तर पर फ्रॉड सामने आया। लक्ष्मी विलास बैंक में तो हजारों लोगों को अपने ही पैसे के लिए परेशान होना पड़ा। 

 

निजीकरण को लेकर आम जनता में जॉब सिक्योरिटी का डर सबसे ऊपर है। सरकारी कर्मचारी को इतना भरोसा होता है कि उसकी नौकरी छोटे-मोटे कारणों से नहीं जाएगी लेकिन प्राइवेट सेक्टर में ऐसा नहीं है। बॉस को नहीं पसंद आने पर भी वह आपको कोई फालतू का कारण बताकर नौकरी से निकाल सकता है। डर का दूसरा कारण सैलरी को लेकर है। 

 

निजी क्षेत्र की कंपनियों की पहली प्राथमिकता अपनी कमाई है, वह कम से कम सैलरी पर ही कर्मचारी हायर करेगा, देश में बेरोजगारी का जो स्तर है उससे यही लगता है कि लोग दो हजार रुपए मासिक में भी काम करने को तैयार हो जाएंगे। ऐसे में देश में गरीबी बढ़ेगी। अमीर-गरीब के बीच जो खाई है वह स्वाभाविक रूप से अधिक होती जाएगी। 

 

निजीकरण का सबसे बड़ा नुकसान चीजों पर प्राइवेट लोगों का नियंत्रण होना है। पहले बैंको से लोन लेने के बाद पूंजीपति उसे वापस नहीं करते थे, बैंक वापसी का जोर देती तो विदेश भाग जाते थे लेकिन अब अगर उन्हीं के हाथों में बैंक चला जाएगा तो वह उसका किस स्तर पर दुरुपयोग करेंगे इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। आरबीआई के पूूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने मोदी सरकार को चेताया भी है कि बैंको को निजी हाथों में देना सबसे खतरनाक फैसला होगा। लेकिन सरकार पर इसका असर होता नहीं दिख रहा। वह एक के बाद एक कंपनियों को निजी हाथों में सौपने पर लगी है।