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कालाराम मंदिर में दलितों के प्रवेश आंदोलन की कहानी और बाबा साहब अंबेडकर का संघर्ष !

कालाराम मंदिर में दलितों के प्रवेश आंदोलन की कहानी और बाबा साहब अंबेडकर का संघर्ष !
फोटो: कालाराम मंदिर में दलितों के प्रवेश आंदोलन की कहानी और बाबा साहब अंबेडकर का संघर्ष !
दलितों के जीवन का संघर्ष का एक मात्र लक्ष्य मंदिर के प्रांगण में बैठना नहीं है लेकिन जो धर्म, जो लोग, अपने फायदे के वक्त दलितों को हिंदू साबित करने में लगे रहते हैं, उनके मंदिर, भगवान, धर्मशास्त्र इन्हीं दलितों के छूने पर 'अपवित्र' हो जाते हैं। हम HistoryWithMolitics में बात करेंगे दलितों के मंदिर में प्रवेश को लेकर हुए सबसे बड़े आंदोलन की जिसने दलितों के लिए एक इतिहास लिख दिया।


कालाराम मंदिर सत्याग्रह - 

2 मार्च 1930 के दिन भीमराव अंबेडकर ने अछूतों के मंदिर में एंट्री करवाने के लिए कालाराम मंदिर सत्याग्रह चलाया था। ये सत्याग्रह नासिक के कालाराम मन्दिर में हुआ था। दरअसल, देश में हिन्दुओं में ऊंची जातियों को जहां जन्म से ही मन्दिर प्रवेश का अधिकार था लेकिन हिन्दू दलितों को ये अधिकार प्राप्त नहीं था। इस सत्याग्रह में करीब 15 हजार दलित शामिल हुए थे, जिनमें ज्यादातर महार समुदाय के थे और महिलाओं की इसमें भारी संख्या भाग लिया था। पूरे महाराष्ट्र भर से लोग इस सत्याग्रह में शामिल होने के लिए नासिक शहर में आए थे। 2 मार्च 1930 को भीमराव अंबेडकर के अध्यक्ष के रूप में एक सभा आयोजित की गई। इस सभा में सत्याग्रह किस प्रकार करना है ? इस पर निर्णय हुए। अहिंसा के मार्ग से सत्याग्रह करना हैं, यह सूचना सबको दी गई। अगले दिन 3 मार्च 1930 को सत्याग्रही की चार टुकड़ियां बनाई गई, जो मन्दिर चार दरवाजों पर तैनात थी। 


 temple satyagraha

 

पुलिस तथा मन्दिर के पुजारियों ने सत्याग्रही की मांग का विरोध करते हुए मन्दिर के सभी दरवाजों को बन्द रखा। पुलिस ने भी पूरे मन्दिर को कड़ी सख़्ती बरती, ताकि कोई अछूत मन्दिर में प्रवेश न कर पाए। शहर के सवर्ण हिन्दुओं ने इन सत्याग्रह करने वालों पर हमला किया, पत्थर बरसाए गए तथा लाठियों और डंडों से वहां आए दलित लोगों की पिटाई की गई। इस घटना में भीमराव अंबेडकर भी घायल हुए। संख्या में सवर्ण हिन्दुओं से कई गुणा अधिक होने के बावजूद भी दलितों ने सवर्णों पर हमला कर हिंसा नहीं की। इनका कहना है कि "अहिंसा से सत्याग्रह करना हैं।" इस भीमराव अंबेडकर के आदेश का पालन सभी दलित कर रहे थे। यह मामला करीब 6 साल तक चला किंतु राम के मन्दिर का दरवाजा दलितों के लिए नहीं खुला। इसके बाद यह हिन्दु धर्म की अपरिवर्तनीयता (स्थायित्व) को देखते हुए अंबेडकर ने हिन्दू धर्म का त्याग करने की घोषणा कर दी।


kalaram temple satyagraha

 

आज की स्थिति में इस आंदोलन का जिक्र करते हुए भावुक हूँ। बाबा साहब अंबेडकर के उस दौर के संघर्ष को हमें सलाम करना चाहिए। यहां बात एक मंदिर में दलितों के प्रवेश की नहीं थी बल्कि लड़ाई उस आत्मसम्मान की है, जो दलितों को हक़ और अधिकार दिलाने वाला था। जो साबित करने वाला था दलित समाज किस पायदान पर खड़ा है। वहीं आपको बता दे कि कालाराम मंदिर में प्रवेश सिर्फ मंदिर प्रवेश का आंदोलन नहीं था।


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